सपना Poetry (page 78)

हज़ार वक़्त के परतव-नज़र में होते हैं

अज़ीज़ हामिद मदनी

एक-आध हरीफ़-ए-ग़म-ए-दुनिया भी नहीं था

अज़ीज़ हामिद मदनी

इक ख़्वाब-ए-आतिशीं का वो महरम सा रह गया

अज़ीज़ हामिद मदनी

मिरे मिज़ाज को सूरज से जोड़ता क्यूँ है

अज़ीज़ बानो दाराब वफ़ा

ख़्वाहिश-ओ-ख़ाब के आगे भी कहीं जाना है

अज़ीम हैदर सय्यद

पढ़िए सबक़ यही है वफ़ा की किताब का

अज़हर नवाज़

शहर गुम-सुम रास्ते सुनसान घर ख़ामोश हैं

अज़हर नक़वी

कोई ऐसी बात है जिस के डर से बाहर रहते हैं

अज़हर नक़वी

गिर्या-ए-शब की शहादत के लिए जागते हैं

अज़हर नक़वी

गिर्दाब-ए-रेग-ए-जान से मौज-ए-सराब तक

अज़हर नक़वी

हुरूफ़ ख़ाली सदफ़ और निसाब ज़ख़्मों के

अज़हर नैयर

हर एक शख़्स यहाँ महव-ए-ख़्वाब लगता है

अज़हर इक़बाल

ये बार-ए-ग़म भी उठाया नहीं बहुत दिन से

अज़हर इक़बाल

उन के भी अपने ख़्वाब थे अपनी ज़रूरतें

अज़हर इनायती

हर एक रात को महताब देखने के लिए

अज़हर इनायती

वो तड़प जाए इशारा कोई ऐसा देना

अज़हर इनायती

जब तक सफ़ेद आँधी के झोंके चले न थे

अज़हर इनायती

हर एक रात को महताब देखने के लिए

अज़हर इनायती

घर का रस्ता जो भूल जाता हूँ

अज़हर इनायती

अटूट अंग

अज़हर गौरी

मंज़र-ए-शाम-ए-ग़रीबाँ है दम-ए-रुख़्सत-ए-ख़्वाब

अज़हर फ़राग़

आँख खुलते ही जबीं चूमने आ जाते हैं

अज़हर फ़राग़

कमी है कौन सी घर में दिखाने लग गए हैं

अज़हर फ़राग़

धूप में साया बने तन्हा खड़े होते हैं

अज़हर फ़राग़

शब भर आँख में भीगा था

अज़हर अदीब

क़ज़ा का तीर था कोई कमान से निकल गया

अज़हर अदीब

लहजे और आवाज़ में रक्खा जाता है

अज़हर अदीब

क्या तेरा क्या मेरा ख़्वाब

अज़हर अदीब

कल परदेस में याद आएगी ध्यान में रख

अज़हर अदीब

घनेरी छाँव के सपने बहुत दिखाए गए

अज़हर अदीब

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