होंठ Poetry (page 37)

ये बात बात में क्या नाज़ुकी निकलती है

दाग़ देहलवी

उज़्र उन की ज़बान से निकला

दाग़ देहलवी

उस के दर तक किसे रसाई है

दाग़ देहलवी

शब-ए-वस्ल भी लब पे आए गए हैं

दाग़ देहलवी

फिरे राह से वो यहाँ आते आते

दाग़ देहलवी

फिर शब-ए-ग़म ने मुझे शक्ल दिखाई क्यूँकर

दाग़ देहलवी

मोहब्बत में आराम सब चाहते हैं

दाग़ देहलवी

फ़लक देता है जिन को ऐश उन को ग़म भी होते हैं

दाग़ देहलवी

बाक़ी जहाँ में क़ैस न फ़रहाद रह गया

दाग़ देहलवी

इस तरह कर गया दिल को मिरे वीराँ कोई

चराग़ हसन हसरत

गुनगुनाती हुई आवाज़ कहाँ से लाऊँ

चरख़ चिन्योटी

अक़्ल हैरान है रहमत का तक़ाज़ा क्या है

चरख़ चिन्योटी

क़तरा क़तरा एहसास

चन्द्रभान ख़याल

ये शहर-ए-ना-रसाई है

बुशरा एजाज़

सोज़-ए-फ़िराक़ दिल में छुपाए हुए हैं हम

बबल्स होरा सबा

अल्लाह अल्लाह वस्ल की शब इस क़दर ए'जाज़ है

बूम मेरठी

फ़राहम जिस क़दर इशरत के सामाँ होते जाते हैं

बिस्मिल सईदी

जब कभी नाम-ए-मोहम्मद लब पे मेरे आए है

बिस्मिल अज़ीमाबादी

सोते में मुस्कुराते बच्चे को देख कर

बिलाल अहमद

नास्टैल्जिया

बिलाल अहमद

एक ख़्वाब

बिलाल अहमद

दीवार-ए-काबा 19 नवम्बर 1989

बिलाल अहमद

बात करने में जो लब उस के हुए ज़ेर-ओ-ज़बर

भारतेंदु हरिश्चंद्र

फिर मुझे लिखना जो वस्फ़-ए-रू-ए-जानाँ हो गया

भारतेंदु हरिश्चंद्र

असीरान-ए-क़फ़स सेहन-ए-चमन को याद करते हैं

भारतेंदु हरिश्चंद्र

वो देखते जाते हैं कनखियों से इधर भी

बेख़ुद देहलवी

तुम हमारे दिल-ए-शैदा को नहीं जानते क्या

बेख़ुद देहलवी

हर एक बात तिरी बे-सबात कितनी है

बेख़ुद देहलवी

दोनों ही की जानिब से हो गर अहद-ए-वफ़ा हो

बेख़ुद देहलवी

आँसू मिरी आँखों में हैं नाले मिरे लब पर

बेखुद बदायुनी

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