होंठ Poetry (page 39)

आवे जो नाज़ से मिरा वो बुत-ए-सीम-बर ब-बर

बक़ा उल्लाह 'बक़ा'

आवे जो नाज़ से मिरा वो बुत-ए-सीम-बर ब-बर

बक़ा उल्लाह 'बक़ा'

सुबुक-सरी में भी अंदेशा-ए-हवा रखना

बाक़र नक़वी

गूँजता शहरों में तन्हाई का सन्नाटा तो है

बाक़र मेहदी

सबा के हाथ पीले हो गए

बलराज कोमल

ज़ेर-ए-लब रख छुपा के नाम उस का

बकुल देव

दिल से बे-सूद और जाँ से ख़राब

बकुल देव

तिश्नगी-ए-लब पे हम अक्स-ए-आब लिक्खेंगे

बख़्श लाइलपूरी

पड़े हैं राह में जो लोग बे-सबब कब से

बख़्श लाइलपूरी

क्या ताब क्या मजाल हमारी कि बोसा लें

ज़फ़र

वो सौ सौ अठखटों से घर से बाहर दो क़दम निकले

ज़फ़र

वाँ रसाई नहीं तो फिर क्या है

ज़फ़र

टुकड़े नहीं हैं आँसुओं में दिल के चार पाँच

ज़फ़र

क़ारूँ उठा के सर पे सुना गंज ले चला

ज़फ़र

पान की सुर्ख़ी नहीं लब पर बुत-ए-ख़ूँ-ख़्वार के

ज़फ़र

क्यूँकि हम दुनिया में आए कुछ सबब खुलता नहीं

ज़फ़र

काफ़िर तुझे अल्लाह ने सूरत तो परी दी

ज़फ़र

जिगर के टुकड़े हुए जल के दिल कबाब हुआ

ज़फ़र

जब कि पहलू में हमारे बुत-ए-ख़ुद-काम न हो

ज़फ़र

गालियाँ तनख़्वाह ठहरी है अगर बट जाएगी

ज़फ़र

गुम हुए जाते हैं धड़कन के निशाँ हम-नफ़सो

बद्र-ए-आलम ख़लिश

चुप थे जो बुत सवाल ब-लब बोलने लगे

बद्र-ए-आलम ख़लिश

अपने चेहरे पर कई चेहरे लिए

बदर जमाली

हवा के लब पे नए इंतिसाब से कुछ हैं

अज़रा वहीद

फ़ज़ा का रंग निखरता दिखाई देता है

अज़रा वहीद

उस ने मेरे नाम सूरज चाँद तारे लिख दिया

अज़रा परवीन

बे-ख़ुदा होने के डर में बे-सबब रोता रहा

अज़रा परवीन

कहीं गोयाई के हाथों समाअत रो रही है

अज़्म बहज़ाद

जो यहाँ हाज़िर है वो मिस्ल-ए-गुमाँ मौजूद है

अज़्म बहज़ाद

शीशा लब से जुदा नहीं होता

अज़ीज़ वारसी

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