होंठ Poetry (page 40)

ग़रीब शहर

अज़ीज़ क़ैसी

दुनिया का ख़ून दौर-ए-मोहब्बत में है सफ़ेद

अज़ीज़ लखनवी

साफ़ बातिन देर से हैं मुंतज़िर

अज़ीज़ लखनवी

क्यूँ न हो शौक़ तिरे दर पे जबीं-साई का

अज़ीज़ लखनवी

काश सुनते वो पुर-असर बातें

अज़ीज़ लखनवी

इंतिहा-ए-इश्क़ हो यूँ इश्क़ में कामिल बनो

अज़ीज़ लखनवी

चश्म-ए-साक़ी का तसव्वुर बज़्म में काम आ गया

अज़ीज़ लखनवी

नारा-ए-तकबीर भी ज़ाहिद निसार-ए-नग़मा है

अज़ीज़ हैदराबादी

ज़ंजीर-ए-पा से आहन-ए-शमशीर है तलब

अज़ीज़ हामिद मदनी

वो एक रौ जो लब-ए-नुक्ता-चीं में होती है

अज़ीज़ हामिद मदनी

सलीब ओ दार के क़िस्से रक़म होते ही रहते हैं

अज़ीज़ हामिद मदनी

नरमी हवा की मौज-ए-तरब-ख़ेज़ अभी से है

अज़ीज़ हामिद मदनी

एक-आध हरीफ़-ए-ग़म-ए-दुनिया भी नहीं था

अज़ीज़ हामिद मदनी

इक ख़्वाब-ए-आतिशीं का वो महरम सा रह गया

अज़ीज़ हामिद मदनी

एक ही शहर में रहते बस्ते काले कोसों दूर रहा

अज़ीज़ हामिद मदनी

ऐ शहर-ए-ख़िरद की ताज़ा हवा वहशत का कोई इनआम चले

अज़ीज़ हामिद मदनी

आतिश-ए-मीना नज़र आई हरीफ़ाना मुझे

अज़ीज़ हामिद मदनी

उस लब की ख़ामुशी के सबब टूटता हूँ मैं

अज़हर फ़राग़

बक़ा-ए-दवाम का मुसाफ़िर

अज़ीम कुरेशी

ये फूल जो मिट्टी के हयूलों से अटा है

अज़ीम कुरेशी

सुरूर-ए-इश्क़ की मस्ती कहाँ है सब के लिए

अज़ीम कुरेशी

तिलिस्म-ए-इस्म-ए-मोहब्बत है दरपय-ए-दर-ए-दिल

अय्यूब ख़ावर

आज शब-ए-मेराज होगी इस लिए तज़ईन है

औरंगज़ेब

किसी इक ज़ख़्म के लब खुल गए थे

अतीक़ुल्लाह

चराग़ हाथों के बुझ रहे हैं सितारा हर रह-गुज़र में रख दे

अतीक़ुल्लाह

बहुत दिन से तुम्हें देखा नहीं था

अतीक़ुल्लाह

धुएँ में डूबे हैं फूल तारे चराग़ जुगनू चिनार कैसे

अतहर सलीमी

क्या वक़्त पड़ा है तिरे आशुफ़्ता-सरों पर

अतहर नफ़ीस

फ़र्ज़ानों की इस बस्ती में एक अजब सौदाई है

अतहर नफ़ीस

मिरी मुश्किल अगर आसाँ बना देते तो अच्छा था

अतीक़ुर्रहमान सफ़ी

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