लहजे Poetry (page 3)

सुर्ख़ चमन ज़ंजीर किए हैं सब्ज़ समुंदर लाया हूँ

साक़ी फ़ारुक़ी

सफ़र की धूप में चेहरे सुनहरे कर लिए हम ने

साक़ी फ़ारुक़ी

ख़ाक नींद आए अगर दीदा-ए-बेदार मिले

साक़ी फ़ारुक़ी

आग हो दिल में तो आँखों में धनक पैदा हो

साक़ी फ़ारुक़ी

ये अलग बात कि वो मुझ से ख़फ़ा रहता है

सलमान अख़्तर

जुर्म-ए-इज़हार-ए-तमन्ना आँख के सर आ गया

सज्जाद बाक़र रिज़वी

आँख से टूट कर गिरी थी नींद

साजिद हमीद

रिसाइकिलबिन

साइमा असमा

सुनते रहते हैं फ़क़त कुछ वो नहीं कह सकते

साइमा असमा

मयस्सर ख़ुद निगह-दारी की आसाइश नहीं रहती

साइमा असमा

मुझ को वीरान सी रातों में जगाने वाले

साहिबा शहरयार

नज़र में रंग समाए हुए उसी के हैं

सईद क़ैस

ख़ुदी मेरा पता देती है अब भी

सईद आरिफ़ी

याद आते हो किस सलीक़े से

रूही कंजाही

इसी बिखरे हुए लहजे पे गुज़ारे जाओ

रउफ़ रज़ा

दोस्त के शहर में जब मैं पहुँचा शहर का मंज़र अच्छा था

रासिख़ फारानी

इक सितारा जो आसमान में है

राशिद क़य्यूम अनसर

मैं दश्त-ए-शेर में यूँ राएगाँ तो होता रहा

राशिद जमाल फ़ारूक़ी

ख़मोश झील में गिर्दाब देख लेते हैं

राशिद जमाल फ़ारूक़ी

दिलों में ख़ौफ़ के चूल्हे की आग ठंडी हो

राना आमिर लियाक़त

अपनों के दरमियान सलामत नहीं रहे

रमेश कँवल

मैं खो गया था कोई शय तलाश करते हुए

राकिब मुख़्तार

अजब नहीं है मुआलिज शिफ़ा से मर जाएँ

राकिब मुख़्तार

चमकती आँख में सहरा दिखाई साफ़ देता है

राजेन्द्र मनचंदा बानी

हादसों ही में ज़िंदगी जी है

रहमत अमरोहवी

हर एक शक्ल में सूरत नई मलाल की है

इरफ़ान सत्तार

लब-ए-गुदाज़ पे अल्फ़ाज़-ए-सख़्त रहते हैं

इक़बाल कैफ़ी

तेरी बातों को छुपाना नहीं आता मुझ से

इक़बाल अशहर

प्यास दरिया की निगाहों से छुपा रक्खी है

इक़बाल अशहर

दिसम्बर आ गया है

इंजील सहीफ़ा

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