वस्त्र Poetry (page 8)

जुज़ क़ैस और कोई न आया ब-रू-ए-कार

ग़ालिब

गर ख़ामुशी से फ़ाएदा इख़्फ़ा-ए-हाल है

ग़ालिब

ये सच नहीं कि तमाज़त से डर गई है नदी

फ़िरदौस गयावी

जिन की ज़िंदगी दामन तक है बेचारे फ़रज़ाने हैं

फ़िराक़ गोरखपुरी

आ के हो जा बे-लिबास

फ़ज़्ल ताबिश

अस्बाब-ए-ज़िंदगी की हर इक चीज़ है गराँ

फ़ज़्ल अहमद करीम फ़ज़ली

सवाल सख़्त था दरिया के पार उतर जाना

फ़ज़ा इब्न-ए-फ़ैज़ी

न दामनों में यहाँ ख़ाक-ए-रहगुज़र बाँधो

फ़ज़ा इब्न-ए-फ़ैज़ी

कोई आँख चुपके चुपके मुझे यूँ निहारती है

फ़े सीन एजाज़

मैं ने माँ का लिबास जब पहना

फ़ातिमा हसन

कौन ख़्वाहिश करे कि और जिए

फ़ातिमा हसन

हर नए मोड़ धूप का सहरा

फ़ारूक़ मुज़्तर

जो रहा यूँ ही सलामत मिरा जज़्ब-ए-वालहाना

फ़ारूक़ बाँसपारी

जब भी मिला वो टूट के हम से मिला तो है

फ़ारूक़ अंजुम

अपने दरिया की प्यास

फ़ारिग़ बुख़ारी

महफ़िल में अब के आओ तो ऐसी ख़ता न हो

फ़रहत एहसास

जिस्म जब महव-ए-सुख़न हों शब-ए-ख़ामोशी से

फ़रहत एहसास

झगड़े ख़ुदा से हो गए अहद-ए-शबाब में

फ़रहत एहसास

शहर-दर-शहर दीदा-वर भटके

फ़रहत अब्बास

ख़याल आतिशीं ख़्वाबीदा सूरतें दी हैं

फ़रहत अब्बास

मिरे चराग़ो मिरा गंज-ए-बे-कराँ ले लो

फ़रहान सालिम

मैं तिरे संग कैसे चलूँ हम-सफ़र तू समुंदर है मैं साहिलों की हवा

फ़रहान सालिम

हमारे तन पे कोई क़ीमती क़बा न सही

फ़राग़ रोहवी

लबों के सामने ख़ाली गिलास रखते हैं

फ़राग़ रोहवी

चेहरे से कब अयाँ है मिरे इज़्तिरार भी

फख़्र अब्बास

वो जितने दूर हैं उतने ही मेरे पास भी हैं

फ़ैज़ुल हसन

तिरे ग़म को जाँ की तलाश थी तिरे जाँ-निसार चले गए

फ़ैज़ अहमद फ़ैज़

जब सजीले ख़िराम करते हैं

फ़ाएज़ देहलवी

गुज़र रहा हूँ मैं सौदा-गरों की बस्ती से

एजाज़ रहमानी

हँसी लबों पे सजाए उदास रहता है

एजाज़ रहमानी

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