जिस्म जब महव-ए-सुख़न हों शब-ए-ख़ामोशी से

जिस्म जब महव-ए-सुख़न हों शब-ए-ख़ामोशी से

लफ़्ज़ तो देते हैं गर्मी-ए-हम-आग़ोशी से

सख़्त अहकाम-ए-मोहब्बत हैं कि दौरान-ए-विसाल

लफ़्ज़ आगे न बढ़ें सरहद-ए-सरगोशी से

नश्शा बढ़ता है हमें देर में मय-नोशी के बा'द

उस की गुंजान ख़मोशी की नवा-नोशी से

देखने हों कभी मा'नी भी तो फिर ख़ाक-ए-विसाल

एक दो लफ़्ज़ जला देती है ख़ामोशी से

झाड़ा-पोछा था अभी सुब्ह को ही ख़ाना-ए-याद

शाम तक अट गया फिर गर्द-ए-फ़रामोशी से

शहर का शोर पहुँचता ही नहीं अब मुझ तक

आफ़ियत में हूँ मोहब्बत की गिराँ-गोशी से

आबले पाँव के पा-पोश हुए आख़िर-कार

उम्र-भर जान बचाई थी जो पा-पोशी से

लोग बनवाने लगे वैसे ही ज़ख़्मों के लिबास

तर्ज़-ए-नौ चल गई 'एहसास' की ख़ुश-पोशी से

आतिश-ए-'फ़र्हत'-ओ-'अस्मा' ने जलाए दो चराग़

एक बीनिश से जला एक जला यूशी से

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