लोग Poetry (page 58)

दीवार याद आ गई दर याद आ गया

अजमल सिराज

वक़्त-ए-सफ़र क़रीब है बिस्तर समेट लूँ

अजमल अजमली

आज़ार बहुत लज़्ज़त-ए-आज़ार बहुत है

अजमल अजमली

लब-ए-दरिया जो प्यासे मर गए हैं

अजीत सिंह हसरत

धुआँ सिफ़त हूँ ख़लाओं का है सफ़र मुझ को

अजीत सिंह हसरत

जब भी मिलते हैं तो जीने की दुआ देते हैं

अजय सहाब

जो मिरी शबों के चराग़ थे जो मिरी उमीद के बाग़ थे

ऐतबार साजिद

ये क्या हालत बना रक्खी है ये आसार कैसे हैं

ऐतबार साजिद

ये हसीं लोग हैं तू इन की मुरव्वत पे न जा

ऐतबार साजिद

तुम्हें ख़याल-ए-ज़ात है शुऊर-ए-ज़ात ही नहीं

ऐतबार साजिद

तिरे जैसा मेरा भी हाल था न सुकून था न क़रार था

ऐतबार साजिद

फूलों में वो ख़ुशबू वो सबाहत नहीं आई

ऐतबार साजिद

मुझे ऐसा लुत्फ़ अता किया कि जो हिज्र था न विसाल था

ऐतबार साजिद

मिरी रूह में जो उतर सकें वो मोहब्बतें मुझे चाहिएँ

ऐतबार साजिद

जो ख़याल थे न क़यास थे वही लोग मुझ से बिछड़ गए

ऐतबार साजिद

दिल हैं यूँ मुज़्तरिब मकानों में

ऐतबार साजिद

बंद दरीचे सूनी गलियाँ अन-देखे अनजाने लोग

ऐतबार साजिद

आँखों से अयाँ ज़ख़्म की गहराई तो अब है

ऐतबार साजिद

ज़ुल्मतों में गो ठहरने को ठहर जाते हैं लोग

ऐश बर्नी

मैं हँस रहा था गरचे मिरे दिल में दर्द था

ऐश बर्नी

सुर्ख़-रू सब को सर-ए-मक़्तल नज़र आने लगे

ऐनुद्दीन आज़िम

बदलने का कोई मौसम नहीं होता

ऐन ताबिश

शहर

ऐन रशीद

नज़्म

ऐन रशीद

नींद को लोग मौत कहते हैं

अहसन यूसुफ़ ज़ई

घर घर आपस में दुश्मनी भी है

अहसन यूसुफ़ ज़ई

होता है दिन-रात यहाँ अब झगड़ा भाई भाई में

अहसन इमाम अहसन

उस ने तोड़ा जहाँ कोई पैमाँ

अहमद ज़फ़र

प्यारे प्यारे युगों में आए प्यारे प्यारे लोग

अहमद वसी

नए ज़मानों की चाप तो सर पे आ खड़ी थी

अहमद शहरयार

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