लोग Poetry (page 56)

ये एक फ़ितरी अमल है

अली साहिल

कम-ज़र्फ़ एहतियात की मंज़िल से आए हैं

अली जव्वाद ज़ैदी

आँख कुछ बे-सबब ही नम तो नहीं

अली जव्वाद ज़ैदी

नीम के उस पेड़ से उतरा है जिन

अली इमरान

चरवाहे का जवाब

अली अकबर नातिक़

घंटियाँ बजने से पहले शाम होने के क़रीब

अली अकबर नातिक़

मैं भरी सड़कों पे भी बे-चाप चलने लग गया

अली अकबर अब्बास

सारा दिन बे-कार बैठे शाम को घर आ गए

अली अकबर अब्बास

अब जाम निगाहों के नशा क्यूँ नहीं देते

अलीम उस्मानी

हर मोड़ पे सफ़र था अजब बोलने न पाए

अलीम सबा नवेदी

बन के साहिल की निगाहों में तमाशा हम लोग

अलीम अफ़सर

असीर-ए-दश्त-ए-बला का न माजरा कहना

आलमताब तिश्ना

सियाह रात के बदन पे दाग़ बन के रह गए

आलम ख़ुर्शीद

कमान छोड़ गए बे-नज़ीर जितने थे

अकमल इमाम

मताअ-ए-राएगाँ

अख़्तर-उल-ईमान

एक एहसास

अख़्तर-उल-ईमान

वो कम-नसीब जो अहद-ए-जफ़ा में रहते हैं

अख़्तर ज़ियाई

अगर बुलंदी का मेरी वो ए'तिराफ़ करे

अख़तर शाहजहाँपुरी

हम आए रोज़ नया ख़्वाब देखते हैं मगर

अख़्तर रज़ा सलीमी

वो हुस्न-ए-सब्ज़ जो उतरा नहीं है डाली पर

अख़्तर रज़ा सलीमी

तुम्हारे होने का शायद सुराग़ पाने लगे

अख़्तर रज़ा सलीमी

हमारे जिस्म अगर रौशनी में ढल जाएँ

अख़्तर रज़ा सलीमी

मेरे किरदार में मुज़्मर है तुम्हारा किरदार

अख़तर मुस्लिमी

दी उस ने मुझ को जुर्म-ए-मोहब्बत की वो सज़ा

अख़तर मुस्लिमी

रौनक़ ही नहीं उस की हम रूह-ओ-रवाँ भी हैं

अख्तर लख़नवी

देखो उस ने क़दम क़दम पर साथ दिया बेगाने का

अख्तर लख़नवी

न जाने लोग ठहरते हैं वक़्त-ए-शाम कहाँ

अख़्तर होशियारपुरी

मिरी गली के मकीं ये मिरे रफ़ीक़-ए-सफ़र

अख़्तर होशियारपुरी

क्या लोग हैं कि दिल की गिरह खोलते नहीं

अख़्तर होशियारपुरी

उफ़ुक़ उफ़ुक़ नए सूरज निकलते रहते हैं

अख़्तर होशियारपुरी

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