मौज Poetry (page 20)

मिरी जाँ अब भी अपना हुस्न वापस फेर दे मुझ को

फ़ैज़ अहमद फ़ैज़

ग़ुबार-ए-ख़ातिर-ए-महफ़िल ठहर जाए

फ़ैज़ अहमद फ़ैज़

ब्लैक-आउट

फ़ैज़ अहमद फ़ैज़

आज इक हर्फ़ को फिर ढूँडता फिरता है ख़याल

फ़ैज़ अहमद फ़ैज़

फिर लौटा है ख़ुर्शीद-ए-जहाँ-ताब सफ़र से

फ़ैज़ अहमद फ़ैज़

अब वही हर्फ़-ए-जुनूँ सब की ज़बाँ ठहरी है

फ़ैज़ अहमद फ़ैज़

आज यूँ मौज-दर-मौज ग़म थम गया इस तरह ग़म-ज़दों को क़रार आ गया

फ़ैज़ अहमद फ़ैज़

मुझे कौन बुलाता रहता है

फ़हीम शनास काज़मी

शाम ख़ामोश है पेड़ों पे उजाला कम है

फ़हीम जोगापुरी

नूर की किरन उस से ख़ुद निकलती रहती है

एजाज़ सिद्दीक़ी

सरोश

एजाज़ फ़ारूक़ी

कतबा

एजाज़ फ़ारूक़ी

किए हैं मुझ पे जो एहसाँ जता नहीं सकता

एजाज़ अासिफ़

बे-नियाज़-ए-सौत-ओ-महरूम-ए-बयाँ रक्खा गया

एजाज़ अासिफ़

ग़म में इक मौज सरख़ुशी की है

एहतिशाम हुसैन

यूँ न मिल मुझ से ख़फ़ा हो जैसे

एहसान दानिश

कल रात कुछ अजीब समाँ ग़म-कदे में था

एहसान दानिश

जब कोई ज़ख़्म उभरता है किनारों जैसा

दिलदार हाश्मी

'ग़ालिब' को बुरा क्यूँ कहो

दिलावर फ़िगार

मुमकिन है कि मिलते कोई दम दोनों किनारे

दिलावर अली आज़र

दूर के एक नज़ारे से निकल कर आई

दिलावर अली आज़र

मैं ग़र्क़ हो रहा था कि तूफ़ान-ए-इश्क़ ने

दिल शाहजहाँपुरी

ऐ इश्क़ तू ने वाक़िफ़-ए-मंज़िल बना दिया

दिल शाहजहाँपुरी

वक़्त की सदियाँ

दाऊद ग़ाज़ी

तेरी गली में मैं न चलूँ और सबा चले

ख़्वाजा मीर 'दर्द'

साकित हो मगर सब को रवानी नज़र आए

दानियाल तरीर

मुमकिन नहीं कि तेरी मोहब्बत की बू न हो

दाग़ देहलवी

बुतान-ए-माहवश उजड़ी हुई मंज़िल में रहते हैं

दाग़ देहलवी

क़रार खो के चले बे-क़रार हो के चले

चरख़ चिन्योटी

क़रार खो के चले बे-क़रार हो के चले

चरख़ चिन्योटी

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