महफ़िल Poetry (page 8)
बे-नंग-ओ-नाम
शाज़ तमकनत
सन कर बयान-ए-दर्द कलेजा दहल न जाए
शाज़ तमकनत
न महफ़िल ऐसी होती है न ख़ल्वत ऐसी होती है
शाज़ तमकनत
मेरी वहशत का तिरे शहर में चर्चा होगा
शाज़ तमकनत
मैं लौट आऊँ कहीं तू ये सोचता ही न हो
शाज़ तमकनत
जाने क्या क़ीमत-ए-अरबाब-ए-वफ़ा ठहरेगी
शाज़ तमकनत
ज़बानें चुप रहें लेकिन मिज़ाज-ए-यार बोलेगा
शायान क़ुरैशी
तुम्हें हुस्न ने पुर-जफ़ा कर दिया
शौक़ देहलवी मक्की
जो मस्त-ए-जाम-ए-बादा-ए-इरफ़ाँ न हो सका
शौक़ बहराइची
हमेशा ग़ैर की इज़्ज़त तिरी महफ़िल में होती है
शौकत थानवी
ज़िंदगी का सफ़र ख़त्म होता रहा तुम मुझे दम-ब-दम याद आते रहे
शौकत परदेसी
मेरे महबूब मिरे दिल को जलाया न करो
शौकत परदेसी
दर से मायूस तिरे तालिब-ए-इकराम चले
शातिर हकीमी
रुका महफ़िल में इतनी देर तक मैं
शारिक़ कैफ़ी
कहाँ सोचा था मैं ने बज़्म-आराई से पहले
शारिक़ कैफ़ी
वो बकरा फिर अकेला पड़ गया है
शारिक़ कैफ़ी
सफ़र से मुझ को बद-दिल कर रहा था
शारिक़ कैफ़ी
कहीं न था वो दरिया जिस का साहिल था मैं
शारिक़ कैफ़ी
कहाँ सोचा था मैं ने बज़्म-आराई से पहले
शारिक़ कैफ़ी
जो कहता है कि दरिया देख आया
शारिक़ कैफ़ी
हाथ आता तो नहीं कुछ प तक़ाज़ा कर आएँ
शारिक़ कैफ़ी
दिलों पर नक़्श होना चाहता हूँ
शारिक़ कैफ़ी
जो अपनी चश्म-ए-तर से दिल का पारा छोड़ जाता है
शारिब मौरान्वी
हर जल्वा-ए-हुस्न बे-वतन है
शम्सुर रहमान फ़ारूक़ी
देखिए बे-बदनी कौन कहेगा क़ातिल है
शम्सुर रहमान फ़ारूक़ी
ये क्या अंदाज़ हैं दस्त-ए-जुनून-ए-फ़ित्ना-सामाँ के
शम्स इटावी
किसी से पूछें कौन बताए किस ने महशर देखा है
शमीम तारिक़
ज़ुल्मत-गह-ए-दौराँ में सुब्ह-ए-चमन-ए-दिल हूँ
शमीम करहानी
सफ़ीना वो कभी शायान-ए-साहिल हो नहीं सकता
शमीम जयपुरी
जब शिकायत थी कि तूफ़ाँ में सहारा न मिला
शमीम जयपुरी
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