मख़गां Poetry (page 3)

ख़ुद कोई चाक-गरेबाँ है रग-ए-जाँ के क़रीब

शमीम करहानी

अब आप रह-ए-दिल जो कुशादा नहीं रखते

शकेब जलाली

दीवार-ए-गिर्या

शाइस्ता मुफ़्ती

ने शिकवा-मंद दिल से न अज़-दस्त-दीदा हूँ

शैख़ ज़हूरूद्दीन हातिम

हर गुल उस बाग़ का नज़रों में दहाँ है गोया

शैख़ ज़हूरूद्दीन हातिम

देखते सज्दे में आता है जो करता है निगाह

शैख़ ज़हूरूद्दीन हातिम

देखना उस की तजल्ली का जिसे मंज़ूर है

शैख़ ज़हूरूद्दीन हातिम

वस्ल की शब में भी हम बाहम दिगर रोया किए

शैख़ करिमुद्दीन मुरादाबादी

इक आग फिर भड़क उट्ठी है दीदा ओ दिल में

शहज़ाद अहमद

ये किस के आने के इम्काँ दिखाई देते हैं

शहज़ाद अहमद

याद के शहर मिरी जाँ से गुज़र

शाहिदा तबस्सुम

धूप के ज़र्द जज़ीरों में नुमू ज़िंदा है

शाहिद कमाल

तार-ए-मिज़्गाँ पे रवाँ यूँ है मिरा तिफ़्ल-ए-सरिश्क

शाह नसीर

सर-ए-मिज़्गाँ ये नाले अब भी आँसू को तरसते हैं

शाह नसीर

ज़ुल्फ़ का क्या उस की चटका लग गया

शाह नसीर

वाँ कमर बाँधे हैं मिज़्गाँ क़त्ल पर दोनों तरफ़

शाह नसीर

सुब्ह-ए-गुलशन में हो गर वो गुल-ए-ख़ंदाँ पैदा

शाह नसीर

न ज़िक्र-ए-आश्ना ने क़िस्सा-ए-बेगाना रखते हैं

शाह नसीर

न क्यूँ कि अश्क-ए-मुसलसल हो रहनुमा दिल का

शाह नसीर

मैं ज़ोफ़ से जूँ नक़्श-ए-क़दम उठ नहीं सकता

शाह नसीर

ख़ाल-ए-मश्शाता बना काजल का चश्म-ए-यार पर

शाह नसीर

हार बना इन पारा-ए-दिल का माँग न गजरा फूलों का

शाह नसीर

गो सियह-बख़्त हूँ पर यार लुभा लेता है

शाह नसीर

फ़ुर्सत एक दम की है जूँ हबाब पानी याँ

शाह नसीर

दिल को किस सूरत से कीजे चश्म-ए-दिलबर से जुदा

शाह नसीर

दिखा दो गर माँग अपनी शब को तो हश्र बरपा हो कहकशाँ पर

शाह नसीर

बादा-कशी के सिखलाते हैं क्या ही क़रीने सावन-भादों

शाह नसीर

क़ैद-ए-दिल से है मिरी काकुल-ए-पेचाँ नाज़ाँ

शाह आसिम

दीवानगी-ए-शौक़ का सामाँ सजा के ला

शफ़ीक़ देहलवी

शक्ल-ए-मिज़्गाँ न ख़ार की सी है

शाद लखनवी

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