नज़र Poetry (page 123)

किसी से लड़ाएँ नज़र और झेलें मोहब्बत के ग़म इतनी फ़ुर्सत कहाँ

अख़्तर अंसारी

हर वक़्त नौहा-ख़्वाँ सी रहती हैं मेरी आँखें

अख़्तर अंसारी

ग़म-ए-हयात कहानी है क़िस्सा-ख़्वाँ हूँ मैं

अख़्तर अंसारी

अपनी बहार पे हँसने वालो कितने चमन ख़ाशाक हुए

अख़्तर अंसारी

जुस्तुजू ने तिरी हर चंद थका रक्खा है

अख़लाक़ बन्दवी

इधर चराग़ जल गए उधर चराग़ जल गए

अख़लाक़ बन्दवी

तिरी आश्नाई से तेरी रज़ा तक

अख़लाक़ अहमद आहन

मुलाहिज़ा हो मिरी भी उड़ान पिंजरे में

अखिलेश तिवारी

वो हज़ार हम पे जफ़ा सही कोई शिकवा फिर भी रवा नहीं

अख़गर मुशताक़ रहीमाबादी

हंगामा-ए-आफ़ात इधर भी है उधर भी

अख़गर मुशताक़ रहीमाबादी

लुटाऊँ मस्तियाँ सरसब्ज़ रहगुज़र की तरह

अकबर काज़मी

पहुँच के जो सर-ए-मंज़िल बिछड़ गया मुझ से

अकबर हैदराबादी

बुरे भले में फ़र्क़ है ये जानते हैं सब मगर

अकबर हैदराबादी

ये कौन मेरी तिश्नगी बढ़ा बढ़ा के चल दिया

अकबर हैदराबादी

सितम-ज़दा कई बशर क़दम क़दम पे थे

अकबर हैदराबादी

घुटन अज़ाब-ए-बदन की न मेरी जान में ला

अकबर हैदराबादी

बदन से रिश्ता-ए-जाँ मो'तबर न था मेरा

अकबर हैदराबादी

अता हुई किसे सनद नज़र नज़र की बात है

अकबर हैदराबादी

किसी को अपने सिवा कुछ नज़र नहीं आता

अकबर हमीदी

शरार-ए-संग जो इस शोर-ओ-शर से निकलेगा

अकबर हमीदी

हँसी में साग़र-ए-ज़र्रीं खनक खनक जाए

अकबर हमीदी

मिस सीमीं बदन

अकबर इलाहाबादी

मदरसा अलीगढ़

अकबर इलाहाबादी

वो हवा न रही वो चमन न रहा वो गली न रही वो हसीं न रहे

अकबर इलाहाबादी

वज़्न अब उन का मुअ'य्यन नहीं हो सकता कुछ

अकबर इलाहाबादी

उन्हें निगाह है अपने जमाल ही की तरफ़

अकबर इलाहाबादी

उम्मीद टूटी हुई है मेरी जो दिल मिरा था वो मर चुका है

अकबर इलाहाबादी

शेख़ ने नाक़ूस के सुर में जो ख़ुद ही तान ली

अकबर इलाहाबादी

मेरे हवास-ए-इश्क़ में क्या कम हैं मुंतशिर

अकबर इलाहाबादी

क्या ही रह रह के तबीअ'त मिरी घबराती है

अकबर इलाहाबादी

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