नज़र Poetry (page 75)

दर्द-ए-दिल के साथ क्या मेरे मसीहा कर दिया

गुहर खैराबादी

दिमाग़ और ही पाती हैं इन हसीनों में

गोया फ़क़ीर मोहम्मद

खोल दी है ज़ुल्फ़ किस ने फूल से रुख़्सार पर

गोया फ़क़ीर मोहम्मद

दुआएँ माँगीं हैं मुद्दतों तक झुका के सर हाथ उठा उठा कर

गोया फ़क़ीर मोहम्मद

शेर जब खुलता है खुलते हैं मआनी क्या क्या

गोविन्द गुलशन

हवा के हाथ में ख़ंजर है और सब चुप हैं

गोविन्द गुलशन

जब मिली उन से नज़र मिटने का सामाँ हो गया

गोर बचन सिंह दयाल मग़मूम

बदन पे जिस के शराफ़त का पैरहन देखा

गोपालदास नीरज

तेरा ख़ुलूस-ए-दिल तो महल्ल-ए-नज़र नहीं

गोपाल मित्तल

फिर वो नज़र है इज़्न-ए-तमाशा लिए हुए

गोपाल मित्तल

मसरफ़ के बग़ैर जल रहा हूँ

गोपाल मित्तल

यास की बदली यूँ दिल पर छा गई

गोपाल कृष्णा शफ़क़

अब और देर न कर हश्र बरपा करने में

ग़ुलाम मुर्तज़ा राही

उबल पड़ा यक-ब-यक समुंदर तो मैं ने देखा

ग़ुलाम मुर्तज़ा राही

ताबीरों से बंद क़बा-ए-ख़्वाब खुले

ग़ुलाम मुर्तज़ा राही

रखता नहीं है दश्त सरोकार आब से

ग़ुलाम मुर्तज़ा राही

क़दमों से मेरे गर्द-ए-सफ़र कौन ले गया

ग़ुलाम मुर्तज़ा राही

मिली राह वो कि फ़रार का न पता चला

ग़ुलाम मुर्तज़ा राही

मौजूदगी का उस की असर होने लगा है

ग़ुलाम मुर्तज़ा राही

हैं और कई रेत के तूफ़ाँ मिरे आगे

ग़ुलाम मुर्तज़ा राही

फ़राख़-दस्त का ये हुस्न-ए-तंग-दस्ती है

ग़ुलाम मुर्तज़ा राही

बात बढ़ती गई आगे मिरी नादानी से

ग़ुलाम मुर्तज़ा राही

आगे आगे शर फैलाता जाता हूँ

ग़ुलाम मुर्तज़ा राही

कितनी ढल गई उम्र तुम्हारी हैरत है

ग़ुलाम मोहम्मद वामिक़

समीता-पाटिल

ग़ुलाम मोहम्मद क़ासिर

कहफ़-उल-क़हत

ग़ुलाम मोहम्मद क़ासिर

सोए हुए जज़्बों को जगाना ही नहीं था

ग़ुलाम मोहम्मद क़ासिर

सीना मदफ़न बन जाता है जीते जागते राज़ों का

ग़ुलाम मोहम्मद क़ासिर

फिर वही कहने लगे तू मिरे घर आया था

ग़ुलाम मोहम्मद क़ासिर

नज़र नज़र में अदा-ए-जमाल रखते थे

ग़ुलाम मोहम्मद क़ासिर

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