नज़र Poetry (page 90)

चालीस चोर

दिलावर फ़िगार

वो शख़्स कभी जिस ने मिरा घर नहीं देखा

दिलावर फ़िगार

सियाह ज़ुल्फ़ को जो बन-सँवर के देखते हैं

दिलावर फ़िगार

वो बहते दरिया की बे-करानी से डर रहा था

दिलावर अली आज़र

मंज़र से उधर ख़्वाब की पस्पाई से आगे

दिलावर अली आज़र

कुछ भी नहीं है ख़ाक के आज़ार से परे

दिलावर अली आज़र

दरून-ए-ख़्वाब नया इक जहाँ निकलता है

दिलावर अली आज़र

शबाब ढलते ही आई पीरी मआ'ल पर अब नज़र हुई है

दिल शाहजहाँपुरी

तमकीं है और हुस्न-ए-गरेबाँ है और हम

दिल शाहजहाँपुरी

फिर ए'तिबार-ए-इश्क़ के क़ाबिल नहीं रहा

दिल शाहजहाँपुरी

कहाँ मैं अभी तक नज़र आ सका हूँ

दिल अय्यूबी

फिर मरहला-ए-ख़्वाब-ए-बहाराँ से गुज़र जा

दिल अय्यूबी

मैं सिर्फ़ वो नहीं जो नज़र आ गया तुझे

दिल अय्यूबी

कहाँ मैं अभी तक नज़र आ सका हूँ

दिल अय्यूबी

हसीं है शहर तो उजलत में क्यूँ गुज़र जाएँ

दिल अय्यूबी

अदा-ए-हैरत-ए-आईना-गर भी रखते हैं

दिल अय्यूबी

वो नहीं मेरा मगर उस से मोहब्बत है तो है

दीप्ति मिश्रा

नज़र आया न कोई भी इधर देखा उधर देखा

दीपक क़मर

ज़ीस्त बे-वादा-ए-अनवार-ए-सहर है कि जो थी

द्वारका दास शोला

ज़रा निगाह उठाओ कि ग़म की रात कटे

द्वारका दास शोला

मेरी मंज़िल कहाँ है क्या मा'लूम

द्वारका दास शोला

अपनों के सितम याद न ग़ैरों की जफ़ा याद

द्वारका दास शोला

वक़्त की सदियाँ

दाऊद ग़ाज़ी

सौग़ात

दाऊद ग़ाज़ी

रात

दाऊद ग़ाज़ी

मज़दूर

दाऊद ग़ाज़ी

जब वो मह-ए-रुख़्सार यकायक नज़र आया

दाऊद औरंगाबादी

या इलाही मुझ को ये क्या हो गया

दत्तात्रिया कैफ़ी

सूरत-ए-हाल अब तो वो नक़्श-ए-ख़याली हो गया

दत्तात्रिया कैफ़ी

क़िस्मत बुरे किसी के न इस तरह लाए दिन

दत्तात्रिया कैफ़ी

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