निशां Poetry (page 15)

सैलाब-ए-ज़िंदगी के सहारे बढ़े चलो

बाक़र मेहदी

जो ज़माने का हम-ज़बाँ न रहा

बाक़र मेहदी

चराग़-ए-हसरत-ओ-अरमाँ बुझा के बैठे हैं

बाक़र मेहदी

अब ख़ानुमाँ-ख़राब की मंज़िल यहाँ नहीं

बाक़र मेहदी

दिल में दिलदार निहाँ था मुझे मा'लूम न था

बाक़र आगाह वेलोरी

इत्तिफ़ाक़

बलराज कोमल

पता मिलता नहीं उस बे-निशाँ का

बहराम जी

रखा सर पर जो आया यार का ख़त

बहराम जी

गुम हुए जाते हैं धड़कन के निशाँ हम-नफ़सो

बद्र-ए-आलम ख़लिश

मसअले ज़ेर-ए-नज़र कितने थे

अज़रा वहीद

दरीदा-पैरहनों में शुमार हम भी हैं

अज़्म शाकरी

हर आईना इक अक्स-ए-नौ ढूँडता है

अज़ीज़ तमन्नाई

बढ़ने दे अभी कशमकश-ए-तार-ए-नफ़स और

अज़ीज़ तमन्नाई

'मीर'

अज़ीज़ लखनवी

नक़्शे उसी के दिल में हैं अब तक खिंचे हुए

अज़ीज़ हामिद मदनी

किसी जनम में जो मेरा निशाँ मिला था उसे

अज़ीज़ बानो दाराब वफ़ा

टटोलता हुआ कुछ जिस्म ओ जान तक पहुँचा

अज़ीज़ बानो दाराब वफ़ा

फूल जो दिल की रहगुज़र में है

अज़ीज़ अन्सारी

मआल-ए-दोस्ती कहिए हदीस-ए-मह-वशाँ कहिए

अज़हर सईद

कोई सिलसिला नहीं जावेदाँ तिरे साथ भी तिरे बा'द भी

अज़हर फ़राग़

ये रात आख़िरी लोरी सुनाने वाली है

अज़हर अब्बास

हवा-ए-तेज़ के आगे कहाँ रहेगा कोई

अज़हर अब्बास

जब से है वो रौनक़-ए-महफ़िल आँखों में

अज़ीम मुर्तज़ा

ग़म का ये सलीक़ा भी रह गया है अब हम तक

अज़ीम मुर्तज़ा

फ़ित्ना-सामाँ ही नहीं फ़ित्ना-ए-सामाँ निकले

अज़ीम मुर्तज़ा

कुछ और हो भी तो राएगाँ है

अय्यूब ख़ावर

किसे दिमाग़ कि उलझे तिलिस्म-ए-ज़ात के साथ

अताउर्रहमान क़ाज़ी

भटक रही है 'अता' ख़ल्क़-ए-बे-अमाँ फिर से

अताउल हक़ क़ासमी

भटक रही है 'अता' ख़ल्क़-ए-बे-अमाँ फिर से

अताउल हक़ क़ासमी

किस से मोहब्बत है

असरार-उल-हक़ मजाज़

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