उम्र Poetry (page 19)

अब भी इक उम्र पे जीने का न अंदाज़ आया

शाद अज़ीमाबादी

ख़ुशबुओं से मिरी हर साँस को भर देता है

शबनम वहीद

वो तो आईना-नुमा था मुझ को

शबनम शकील

तन्हा खड़े हैं हम सर-ए-बाज़ार क्या करें

शबनम शकील

मंज़र से कभी दिल के वो हटता ही नहीं है

शबनम शकील

कितने अंजान जज़ीरों में मुझे ले के चला

शबनम शकील

दूर हुआ इबहाम कहानी ख़त्म हुई

शबनम शकील

बे-वजह तहफ़्फ़ुज़ की ज़रूरत भी नहीं है

शबनम शकील

तमाम उम्र की आवारगी पे भारी है

शबनम रूमानी

मैं ने किस शौक़ से इक उम्र ग़ज़ल-ख़्वानी की

शबनम रूमानी

आधा जीवन बीता आहें भरने में

शबनम रूमानी

नज़्म

शबनम अशाई

नज़्म

शबनम अशाई

बहुत कुछ लिखा है बहुत कुछ लिखेंगे

शब्बीर नकिद

हिसार-ए-ज़ात में सारा जहान होना था

शबाना यूसुफ़

शब-ए-विसाल थी रौशन फ़ज़ा में बैठा था

शबाब ललित

अन-गिनत शादाब जिस्मों की जवानी पी गया

शबाब ललित

जहान-ए-दिल में हुए इंक़लाब और ही कुछ

शानुल हक़ हक़्क़ी

मुद्दत से ढूँडती है किसी की नज़र मुझे

शाद अमृतसरी

ब-पास-ए-एहतियात-ए-आरज़ू ये बार-हा हुआ

शाद आरफ़ी

अजीब शाम थी जब लौट कर मैं घर आया

सीमान नवेद

फिर आ गया ज़बाँ पे वही नाम क्या करें

सीमाब सुल्तानपुरी

किताब-ए-उम्र में इक वो भी बाब होता है

सीमाब सुल्तानपुरी

अल्लाह दे सके तो दे ऐसी ज़बाँ मुझे

सीमाब सुल्तानपुरी

हुस्न-ए-फ़ानी पर हम अपना दिल फ़िदा करते रहे

सीमाब बटालवी

खो कर तिरी गली में दिल-ए-बे-ख़बर को मैं

सीमाब अकबराबादी

जो उम्र तेरी तलब में गँवाए जाते हैं

सीमाब अकबराबादी

जो मेरे तंगना-ए-दिल में तुझ को जल्वा-गर देखा

सीमाब अकबराबादी

जरस है कारवान-ए-अहल-ए-आलम में फ़ुग़ाँ मेरी

सीमाब अकबराबादी

हद हो कोई तो सब्र तिरे हिज्र पर करें

सीमाब अकबराबादी

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