उम्र Poetry (page 17)

जान मुक़द्दर में थी जान से प्यारा न था

शहज़ाद अहमद

इसी बाइस ज़माना हो गया है उस को घर बैठे

शहज़ाद अहमद

घर जला लेता है ख़ुद अपने ही अनवार से तू

शहज़ाद अहमद

दिल-ए-फ़सुर्दा उसे क्यूँ गले लगा न लिया

शहज़ाद अहमद

अस्ल में हूँ मैं मुजरिम मैं ने क्यूँ शिकायत की

शहज़ाद अहमद

एक और साल गिरह

शहरयार

गर्द को कुदूरतों की धो न पाए हम

शहरयार

भटक गया कि मंज़िलों का वो सुराग़ पा गया

शहरयार

शिकस्त

शहराम सर्मदी

मुझे तस्लीम बे-चून-ओ-चुरा तू हक़-ब-जानिब था

शहराम सर्मदी

जो इस बरस नहीं अगले बरस में दे दे तू

शहराम सर्मदी

किसी से हाथ किसी से नज़र मिलाते हुए

शहनाज़ नूर

रौशन आईनों में झूटे अक्स उतार गया

शहनवाज़ ज़ैदी

मिरे ख़ुदा कोई छाँव कोई ज़मीं कोई घर

शहनवाज़ ज़ैदी

जब आफ़्ताब से चेहरा छुपा रही थी हवा

शहनवाज़ ज़ैदी

सराब-ए-शब भी है ख़्वाब-ए-शिकस्ता-पा भी है

शाहिदा हसन

कोई सर्द हवा लब-ए-बाम चली

शाहिदा हसन

जब घर ही जुदा जुदा रहेगा

शाहिदा हसन

पुकारती है जो तुझ को तिरी सदा ही न हो

शाहिद कबीर

क्या फ़र्ज़ है ये जिस्म के ज़िंदाँ में सज़ा दे

शाहिद कबीर

सीने हैं चाक और गरेबाँ सिले हुए

शाहिद इश्क़ी

रात है शहर-ए-बुताँ है और हम

शाहिद इश्क़ी

नुक़ूश-ए-रहगुज़र-ए-शौक़ सब मिटा देना

शाहिद इश्क़ी

लज़्ज़त-ए-संग न पूछो लोगो उम्र अगर हाथ आए फिर

शाहिद इश्क़ी

ग़ैर की आग में कोई भी न जलना चाहे

शाहिद इश्क़ी

एक तुम्हारे प्यार की ख़ातिर जग के दुख अपनाए थे

शाहिद इश्क़ी

वो बे-नियाज़ शब-ओ-रोज़-ओ-माह-ओ-साल गया

शाहिद अहमद शोएब

ऐ निगार-ए-ग़म-ओ-आलाम तिरी उम्र दराज़

शाहिद अहमद शोएब

ऐ निगार-ए-ग़म-ओ-आलाम तिरी उम्र दराज़

शाहिद अहमद शोएब

सच का लम्हा जब भी नाज़िल होता है

शाहीन ग़ाज़ीपुरी

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