पास Poetry (page 15)

जिस का राहिब शैख़ हो बुत-ख़ाना ऐसा चाहिए

सरदार गेंडा सिंह मशरिक़ी

इलाही ख़ैर हो वो आज क्यूँ कर तन के बैठे हैं

सरदार गेंडा सिंह मशरिक़ी

बोसा देते हो अगर तुम मुझ को दो दो सब के दो

सरदार गेंडा सिंह मशरिक़ी

ख़त हो कोई किताब हो या दिल का ज़ख़्म हो

सदार आसिफ़

ये लफ़्ज़ लफ़्ज़ शोला-बयानी उसी की है

सदार आसिफ़

शायद मिट्टी मुझे फिर पुकारे

सारा शगुफ़्ता

बदन से पूरी आँख है मेरी

सारा शगुफ़्ता

आँखें दो जुडवाँ बहनें

सारा शगुफ़्ता

आधा कमरा

सारा शगुफ़्ता

हज़ार फूल लिए मौसम-ए-बहार आए

साक़िब लखनवी

ग़श भी आया मिरी पुर्सिश को क़ज़ा भी आई

साक़िब लखनवी

नामों का इक हुजूम सही मेरे आस-पास

साक़ी फ़ारुक़ी

मिट जाएगा सेहर तुम्हारी आँखों का

साक़ी फ़ारुक़ी

ज़िंदा पानी सच्चा

साक़ी फ़ारुक़ी

तौजीह

साक़ी फ़ारुक़ी

मैं और मैं!

साक़ी फ़ारुक़ी

एक सुअर से

साक़ी फ़ारुक़ी

अलकुबड़े

साक़ी फ़ारुक़ी

यूँ मिरे पास से हो कर न गुज़र जाना था

साक़ी फ़ारुक़ी

मुझ को मिरी शिकस्त की दोहरी सज़ा मिली

साक़ी फ़ारुक़ी

मुझे ख़बर थी मिरा इंतिज़ार घर में रहा

साक़ी फ़ारुक़ी

मैं फिर से हो जाऊँगा तन्हा इक दिन

साक़ी फ़ारुक़ी

वो आरज़ू कि दिलों को उदास छोड़ गई

समद अंसारी

हम रूह-ए-काएनात हैं नक़्श-ए-असास हैं

समद अंसारी

वो पास रह के भी मुझ में समा नहीं सकता

सलमान अख़्तर

कितना मुश्किल हो गया हूँ हिज्र में उस के सो वो

सालिम सलीम

नए जहानों का इक इस्तिआरा कर के लाओ

सालिम सलीम

मेरी अर्ज़ानी से मुझ को वो निकालेगा मगर

सालिम सलीम

कहीं पे चीख़ होगी और कहीं किलकारियां होंगी

सलीम रज़ा रीवा

मेरे एहसास की रग रग में समाने वाले

सलीम शाहिद

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