पास Poetry (page 18)

आदमी का नशा

सईदुद्दीन

कोई पास आया सवेरे सवेरे

सईद राही

उज़्र हवा ने क्या रक्खा है

सईद क़ैस

उश्शाक़ जाँ-ब-कफ़ खड़े हैं तेरे आस-पास

सदरुद्दीन मोहम्मद फ़ाएज़

ऐ ख़ूब-रू फ़रिश्ता सियर-अंजुमन में आ

सदरुद्दीन मोहम्मद फ़ाएज़

दुरून-ए-चश्म हर इक ख़्वाब मर रहा है बस

सादिया सफ़दर सादी

उदास उदास सर-ए-साग़र-ओ-सुबू भी मैं

सादिक़ नसीम

जब भी तिरी क़ुर्बत के कुछ इम्काँ नज़र आए

सादिक़ नसीम

ये इंतिहा-ए-जुनूँ है कि ग़ैर ही सा लगा

सादिक़ इंदौरी

'सदा' के पास है दुनिया का तजरबा वाइज़

सदा अम्बालवी

नींद आई ही नहीं हम को न पूछो कब से

सदा अम्बालवी

न ज़िक्र गुल का कहीं है न माहताब का है

सदा अम्बालवी

जीने का दरस सब से जुदा चाहिए मुझे

साबिर ज़फ़र

ख़िज़ाँ से सीना भरा हो लेकिन तुम अपना चेहरा गुलाब रखना

साबिर वसीम

अब उठाओ नक़ाब आँखों से

साबिर दत्त

ये दिल की दास्तान है कि दिल ग़ुलाम कर दिया

सबीहा सबा, पाकिस्तान

अगर नहीं है इजाज़त सवाल मत करना

सबीहा सबा, पाकिस्तान

बस अना को बहाल रखना है

सबीला इनाम सिद्दीक़ी

ख़िज़ाँ का जो गुलशन से पड़ जाए पाला

साइल देहलवी

कैसे करूँ मैं ज़ब्त-ए-राज़ तू ही मुझे बता कि यूँ

एस ए मेहदी

मोम पिघलाता रहा तेरा ख़याल

रुख़साना नूर

गरचे मिरे ख़ुलूस से वो बे-ख़बर न था

रोहित सोनी ‘ताबिश’

अज़ीज़ इतना तिरा रंग-ओ-बू लगे है मुझे

रिज़वानूरर्ज़ा रिज़वान

'रियाज़' तौबा न टूटे न मय-कदा छूटे

रियाज़ ख़ैराबादी

'रियाज़' एहसास-ए-ख़ुद्दारी पे कितनी चोट लगती है

रियाज़ ख़ैराबादी

डर है न दुपट्टा कहीं सीने से सरक जाए

रियाज़ ख़ैराबादी

मय रहे मीना रहे गर्दिश में पैमाना रहे

रियाज़ ख़ैराबादी

जी उठे हश्र में फिर जी से गुज़रने वाले

रियाज़ ख़ैराबादी

गुल मुरक़्क़ा' हैं तिरे चाक गरेबानों के

रियाज़ ख़ैराबादी

वही तवील सी राहें सफ़र वही तन्हा

ऋषि पटियालवी

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