पास Poetry (page 19)

तू आप को पोशीदा ओ इख़्फ़ा न समझना

रिन्द लखनवी

तौबा का पास रिंद-ए-मय-आशाम हो चुका

रिन्द लखनवी

सातों फ़लक किए तह-ओ-बाला निकल गया

रिन्द लखनवी

न अंगिया न कुर्ती है जानी तुम्हारी

रिन्द लखनवी

कौन से जज़्बात ले कर तेरे पास आया करूँ

रियाज़ मजीद

शीशा-सिफ़त थे आप और शीशा-सिफ़त थे हम

रेनू नय्यर

ज़ियादा पास मत आना

रहमान फ़ारिस

क्यूँ तिरे साथ रहीं उम्र बसर होने तक

रहमान फ़ारिस

जो भीक माँगते हुए बच्चे के पास था

रेहाना रूही

तेरी गली को छोड़ के जाना तो है नहीं

रेहाना रूही

सफ़र में रस्ता बदलने के फ़न से वाक़िफ़ है

रेहाना रूही

नज़्ज़ारा-ए-जमाल ने सोने नहीं दिया

रेहाना रूही

उस का चेहरा भी सुनाता है कहानी उस की

रेहाना क़मर

रंग अब यूँ तिरी तस्वीर में भरता जाऊँ

राज़ी अख्तर शौक़

मुझ को जो कहते हो म्याँ तुम हो कहाँ तुम हो कहाँ

रज़ा अज़ीमाबादी

हर नफ़स मूरिद-ए-सफ़र हैं हम

रज़ा अज़ीमाबादी

हूँ शामिल सब में और सब से जुदा हूँ

रज़ा अमरोही

दिल बता और क्या है होने को

रज़ा अमरोही

नाश्ते पर जिसे आज़ाद किया है मैं ने

रउफ़ रज़ा

न जाने कब बसर हुए न जाने कब गुज़र गए

रशक खलीली

हर ख़ुशी तेरे नाम की मैं ने

राशिद क़य्यूम अनसर

जो क़र्ज़ मुझ पे है वो बोझ उतारता जाऊँ

राशिद मुफ़्ती

क्या कोई याद तिरे दिल को दुखाती है हवा

राशिद अनवर राशिद

ख़िलाफ़ सारी लकीरें थीं हाथ मलते क्या

राशिद अनवर राशिद

अब तो इक पल के लिए भी न गंवाएँगे तुम्हें

राशिद अनवर राशिद

मालूम है वो मुझ से ख़फ़ा है भी नहीं भी

राशिद आज़र

किसी का उन्हें पास-ए-ग़ुर्बत नहीं है

रशीद रामपुरी

खुला ये उन के अंदाज़-ए-बयाँ से

रशीद रामपुरी

तन्हाइयों का हब्स मुझे काटता रहा

रशीद क़ैसरानी

तन्हाइयों का हब्स मुझे काटता रहा

रशीद क़ैसरानी

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