पंछी Poetry (page 1)

वो बूढ़ा इक ख़्वाब है और इक ख़्वाब में आता रहता है

ज़ुल्फ़िक़ार आदिल

दीपक-राग है चाहत अपनी काहे सुनाएँ तुम्हें

ज़ुहूर नज़र

शिकस्त-ए-आरज़ू

ज़ेहरा अलवी

गहरी रात है और तूफ़ान का शोर बहुत

ज़ेब ग़ौरी

ख़ुद अपनी सोच के पंछी न अपने बस में रहे

ज़मान कंजाही

तुम जो आते हो

वज़ीर आग़ा

पीपल

वज़ीर आग़ा

शाम के दिन रात

वहीद अहमद

अपनी तो गुज़री है अक्सर अपनी ही मन-मानी में

विलास पंडित मुसाफ़िर

जो भी तेरी आँख को भा जाएगा

तुफ़ैल बिस्मिल

वो जो इक इल्ज़ाम था उस पर कहीं

तौक़ीर रज़ा

निकले लोग सफ़र पर शब के जंगल में

तारिक़ पीरज़ादा

ढलती रात

तख़्त सिंह

भूली-बिसरी रात

तख़्त सिंह

हर अश्क तिरी याद का नक़्श-ए-कफ़-ए-पा है

तख़्त सिंह

क़िस्सा-ए-शब

ताबिश कमाल

उस रोज़ तुम कहाँ थे

तबस्सुम काश्मीरी

खड़खड़ाता एक पत्ता जब गिरा इक पेड़ से

सय्यद फ़ज़लुल मतीन

वो तो हर चाहने वाले पे फ़िदा लगता है

सुहैल सानी

गाँव गाँव ख़ामोशी सर्द सब अलाव हैं

सिब्त अली सबा

मसअले का हल न निकला देर तक

श्याम सुन्दर नंदा नूर

ज़िंदगानी का क्या करें साहब

शुबह तराज़

सराबों का सफ़र

शमीम क़ासमी

कोई ऐसे वक़्त में हम से बिछड़ा है

शमीम अब्बास

उम्र गुज़र जाती है क़िस्से रह जाते हैं

शमीम अब्बास

तू क्या जाने तेरी बाबत क्या क्या सोचा करते हैं

शमीम अब्बास

अन-कही

शहज़ाद अहमद

जब तुम मुझ से मिलने आओ

शहराम सर्मदी

खोट की माला झूट जटाएँ अपने अपने ध्यान

सीमाब ज़फ़र

डिकलाइन

सीमा ग़ज़ल

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