रास्ता Poetry (page 16)

लाई हयात आए क़ज़ा ले चली चले

ज़ौक़

कल गए थे तुम जिसे बीमार-ए-हिज्राँ छोड़ कर

ज़ौक़

जुदा हों यार से हम और न हो रक़ीब जुदा

ज़ौक़

हाथ सीने पे मिरे रख के किधर देखते हो

ज़ौक़

अज़ीज़ो इस को न घड़ियाल की सदा समझो

ज़ौक़

मेरी नज़र का मुद्दआ उस के सिवा कुछ भी नहीं

शहपर रसूल

कोई साया न कोई हम-साया

शहपर रसूल

मर गए हैं जो हिज्र-ए-यार में हम

मुस्तफ़ा ख़ाँ शेफ़्ता

मौज-ए-हवा से फूलों के चेहरे उतर गए

शीन काफ़ निज़ाम

अजनबी

शाज़ तमकनत

वो नियाज़-ओ-नाज़ के मरहले निगह-ओ-सुख़न से चले गए

शाज़ तमकनत

सोज़-ए-दुआ से साज़-ए-असर कौन ले गया

शाज़ तमकनत

मेरी वहशत का तिरे शहर में चर्चा होगा

शाज़ तमकनत

कौन देता रहा सहरा में सदा मेरी तरह

शाज़ तमकनत

बना हुस्न-ए-तकल्लुम हुस्न-ए-ज़न आहिस्ता आहिस्ता

शाज़ तमकनत

सफ़र कहने को जारी है मगर अज़्म-ए-सफ़र ग़ाएब

शायान क़ुरैशी

हुई या मुझ से नफ़रत या कुछ इस में किब्र-ओ-नाज़ आया

शौक़ क़िदवाई

न दे साक़ी मुझे कुछ ग़म नहीं है

शौक़ बहराइची

गिन के देता है बला-नोशों को पैमाना अभी

शौक़ बहराइची

आँसू मिरी आँखों से टपक जाए तो क्या हो

शौक़ बहराइची

नज़र-नवाज़ नज़ारों की याद आती है

शौकत परदेसी

दस्त-ए-ज़रूरियात में बटता चला गया

शौकत फ़हमी

ये रात कितनी भयानक है बाम-ओ-दर के लिए

शातिर हकीमी

काट कर जो राह का बूढ़ा शजर ले जाएगा

शर्मा तासीर

ग़ज़ल वही है जो हो शाख़-ए-गुल-निशाँ की तरह

शारिक़ ईरायानी

हवा की राह-नुमाई पे शक नहीं रखते

शरीक़ अदील

पामालियों का ज़ीना है अर्श से भी ऊँचा

शरफ़ मुजद्दिदी

मौज-ए-दरिया को पिएँ क्या ग़म-ए-ख़म्याज़ा करें

शम्सुर रहमान फ़ारूक़ी

चेहरे का आफ़्ताब दिखाई न दे तो फिर

शम्सुर रहमान फ़ारूक़ी

न कोई अपना ग़म है और न अब कोई ख़ुशी अपनी

शम्स फ़र्रुख़ाबादी

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