रात Poetry (page 30)

सजाएँ महफ़िल-ए-याराँ न शग़्ल-ए-जाम करें

शाहिद अख़्तर

चाँद माँगा न कभी हम ने सितारे माँगे

शाहिद अख़्तर

आप के इज़्न-ए-मुलाक़ात से जी डरता है

शाहिद अख़्तर

दिल के ज़ख़्मों की लवें और उभारो लोगो

शाहिद अहमद शोएब

यूँ उलझ कर रह गई है तार-ए-पैराहन में रात

शाहीन ग़ाज़ीपुरी

हम पे जिस तौर भी तुम चाहो नज़र कर देखो

शाहीन ग़ाज़ीपुरी

दिन छोटा है रात बड़ी है

शाहीन ग़ाज़ीपुरी

ज़मीं का आख़िरी मंज़र दिखाई देने लगा

शाहीन अब्बास

दिए का काम अब आँखें दिखाना रह गया है

शाहीन अब्बास

देखना है कब ज़मीं को ख़ाली कर जाता है दिन

शाहीन अब्बास

आँखों से यूँ चराग़ों में डाली है रौशनी

शाहीन अब्बास

किसी ने देख लिया था जो साथ चलते हुए

शहबाज़ ख़्वाजा

तलाश

शहाब जाफ़री

सूरज का शहर

शहाब जाफ़री

याद उस की है कुछ ऐसी कि बिसरती भी नहीं

शहाब जाफ़री

क़ैद-ए-इम्काँ से तमन्ना थी गमीं छूट गई

शहाब जाफ़री

मैं ही मैं बिखरा हुआ हूँ राह-ता-मंज़िल तमाम

शहाब जाफ़री

हिज्र-ओ-विसाल-ए-यार का मौसम निकल गया

शहाब जाफ़री

बे-सर-ओ-सामाँ कुछ अपनी तब्अ से हैं घर में हम

शहाब जाफ़री

मेरा उस का साथ

शहाब अख़्तर

वस्ल की रात हम-नशीं क्यूँकि कटी न पूछ कुछ

शाह नसीर

दिन रात यहाँ पुतलियों का नाच रहे है

शाह नसीर

टाँकों से ज़ख़्म-ए-पहलू लगता है कंखजूरा

शाह नसीर

शब जो रुख़-ए-पुर-ख़ाल से वो बुर्के को उतारे सोते हैं

शाह नसीर

पामाल-ए-राह-ए-इश्क़ हैं ख़िल्क़त की खा ठोकर भी हम

शाह नसीर

मेरी तुर्बत पर चढ़ाने ढूँडता है किस के फूल

शाह नसीर

जो रक़ीबों ने कहा तू वही बद-ज़न समझा

शाह नसीर

हो चुकी बाग़ में बहार अफ़सोस

शाह नसीर

ग़र्क़ न कर दिखला कर दिल को कान का बाला ज़ुल्फ़ का हल्क़ा

शाह नसीर

इक क़ाफ़िला है बिन तिरे हम-राह सफ़र में

शाह नसीर

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