रात Poetry (page 29)

आँधी की ज़द में शम-ए-तमन्ना जलाई जाए

शहरयार

सुन रखा था तजरबा लेकिन ये पहला था मिरा

शहराम सर्मदी

मैं नहीं रोता हूँ अब ये आँख रोती है मुझे

शहराम सर्मदी

इस सोच में ही मरहला-ए-शब गुज़र गया

शहराम सर्मदी

हमारे ज़ेहन में ये बात भी नहीं आई

शहराम सर्मदी

ग़ुबार-ए-दर्द में राह-ए-नजात ऐसा ही

शहराम सर्मदी

रौशन आईनों में झूटे अक्स उतार गया

शहनवाज़ ज़ैदी

मोहब्बत से तिरी यादें जगा कर सो रहा हूँ

शहनवाज़ ज़ैदी

मिसरे के वस्त में खड़ा हूँ

शहनवाज़ ज़ैदी

जब आफ़्ताब से चेहरा छुपा रही थी हवा

शहनवाज़ ज़ैदी

वहशतों को भी अब कमाल कहाँ

शाहिदा हसन

सवाद-ए-शाम से ता-सुब्ह-ए-बे-किनार गई

शाहिदा हसन

कोई सर्द हवा लब-ए-बाम चली

शाहिदा हसन

हवा पे चल रहा है चाँद राह-वार की तरह

शाहिदा हसन

यूँ मुझे तेरी सदा अपनी तरफ़ खींचती है

शाहिद ज़की

ख़ौफ़ से अब यूँ न अपने घर का दरवाज़ा लगा

शाहिद मीर

अजीब लोग

शाहिद माहुली

बुझे बुझे से चराग़ों से सिलसिला पाया

शाहिद माहुली

सोच रहा है इतना क्यूँ ऐ दस्त-ए-बे-ताख़ीर निकाल

शाहिद कमाल

ग़मों की रात है और इतनी मुख़्तसर भी नहीं

शाहिद कमाल

मैं इंतिहा-ए-यास में तन्हा खड़ा रहा

शाहिद कलीम

जो देखता है मुझे आईने के अंदर से

शाहिद कलीम

जलती बुझती हुई शम्ओं का धुआँ रहता है

शाहिद कलीम

कुछ तो हो रात की सरहद में उतरने की सज़ा

शाहिद कबीर

कुछ देर काली रात के पहलू में लेट के

शाहिद कबीर

कर्ब चेहरे से मह-ओ-साल का धोया जाए

शाहिद कबीर

शहर-ए-निगाराँ में फिरते हैं हम आवारा रात ढले

शाहिद इश्क़ी

कुछ अपनी बात कहो कुछ मिरी सुनो मत सो

शाहिद इश्क़ी

जाने क्या वज्ह-ए-बेगानगी है

शाहिद इश्क़ी

किस क़दर है मुहीब सन्नाटा

शाहिद फ़रीद

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