रंग Poetry (page 43)

शराफ़तों के रंग में शरारतें ख़लत-मलत

राही फ़िदाई

ख़ुद को मुम्ताज़ बनाने की दिली-ख़्वाहिश में

राही फ़िदाई

जो बे-रुख़ी का रंग बहुत तेज़ मुझ में है

इरफ़ान सत्तार

अजब है रंग-ए-चमन जा-ब-जा उदासी है

इरफ़ान सत्तार

अब तिरे लम्स को याद करने का इक सिलसिला और दीवाना-पन रह गया

इरफ़ान सत्तार

हम बाग़-ए-तमन्ना में दिन अपने गुज़ार आए

इरम लखनवी

हुस्न-ए-फ़ितरत की आबरू मुझ से

इक़बाल सुहैल

न रहा ज़ौक़-ए-रंग-ओ-बू मुझ को

इक़बाल सुहैल

हुस्न-ए-फ़ितरत की आबरू मुझ से

इक़बाल सुहैल

अंजाम-ए-वफ़ा भी देख लिया अब किस लिए सर ख़म होता है

इक़बाल सुहैल

वो दोस्त था तो उसी को अदू भी होना था

इक़बाल साजिद

सूरज हूँ चमकने का भी हक़ चाहिए मुझ को

इक़बाल साजिद

ग़ार से संग हटाया तो वो ख़ाली निकला

इक़बाल साजिद

ग़ार से संग हटाया तो वो ख़ाली निकला

इक़बाल साजिद

इक रिदा-ए-सब्ज़ की ख़्वाहिश बहुत महँगी पड़ी

इक़बाल साजिद

कोई समझाए कि क्या रंग है मयख़ाने का

इक़बाल सफ़ी पूरी

सरसर चली वो गर्म कि साए भी जल गए

इक़बाल मिनहास

न कोई ग़ैर न अपना दिखाई देता है

इक़बाल मिनहास

उस को नग़्मों में समेटूँ तो बुका जाने है

इक़बाल मतीन

मिरी ख़ाक उस ने बिखेर दी सर-ए-रह ग़ुबार बना दिया

इक़बाल कौसर

काहिश-ए-ग़म ने जिगर ख़ून किया अंदर से

इक़बाल कौसर

कभी आइने सा भी सोचना मुझे आ गया

इक़बाल कौसर

जो ज़ख़्म जम्अ किए आँख-भर सुनाता हूँ

इक़बाल कौसर

ग़ज़ल के रंग में मल्बूस हो कर

इक़बाल कैफ़ी

गुहर समझा था लेकिन संग निकला

इक़बाल कैफ़ी

जो तेरे दर्द हैं वही सब मेरे दर्द हैं

इक़बाल हैदर

जिस में न कोई रंग न आहंग न ख़ुशबू

इक़बाल अज़ीम

ये निगाह-ए-शर्म झुकी झुकी ये जबीन-ए-नाज़ धुआँ धुआँ

इक़बाल अज़ीम

अपने मरकज़ से अगर दूर निकल जाओगे

इक़बाल अज़ीम

ऐ अहल-ए-वफ़ा दाद-ए-जफ़ा क्यूँ नहीं देते

इक़बाल अज़ीम

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