साथ Poetry (page 38)

ख़ुमार-ए-शब में जो इक दूसरे पे गिरते हैं

साबिर ज़फ़र

ये उम्र भर का सफ़र है इसी सहारे पर

साबिर वसीम

पहला पत्थर याद हमेशा रहता है

साबिर वसीम

इक शोर समेटो जीवन भर और चुप दरिया में उतर जाओ

साबिर वसीम

तेरी याद मेरी भूल

साबिर दत्त

और मोड़ ने कहा

साबिर दत्त

जान भी साथ छोड़ देती है

साबिर बद्र जाफ़री

'बद्र' यूँ तो सभी से मिलता है

साबिर बद्र जाफ़री

इक तिरी याद से यादों के ख़ज़ाने निकले

सबीहा सबा, पाकिस्तान

बस अना को बहाल रखना है

सबीला इनाम सिद्दीक़ी

गए थे नक़्द-ए-गिराँ-माया-ए-ख़ुलूस के साथ

सबा अकबराबादी

उस का वादा ता-क़यामत कम से कम

सबा अकबराबादी

तुझ से दामन-कशाँ नहीं हूँ मैं

सबा अकबराबादी

सोना था जितना अहद-ए-जवानी में सो लिए

सबा अकबराबादी

पूरी मिरे जुनूँ की ज़रूरत न कर सके

सबा अकबराबादी

इस रंग में अपने दिल-ए-नादाँ से गिला है

सबा अकबराबादी

ये जमाल क्या ये जलाल क्या ये उरूज क्या ये ज़वाल क्या

सादुल्लाह शाह

किसी भी वहम को ख़ुद पर सवार मत करना

सादुल्लाह शाह

तो मिल भी जाए तो फिर भी तुझे तलाश करूँ

रूही कंजाही

और अभी तेज़ दौड़ना है मुझे

रूही कंजाही

गरचे मिरे ख़ुलूस से वो बे-ख़बर न था

रोहित सोनी ‘ताबिश’

इसी लिबास इसी पैरहन में रहना है

रिज़वानूरर्ज़ा रिज़वान

रहमत से 'रियाज़' उस की थे साथ फ़रिश्ते दो

रियाज़ ख़ैराबादी

इस हज में वो बुत भी साथ होगा

रियाज़ ख़ैराबादी

ज़रूर पाँव में अपने हिना वो मल के चले

रियाज़ ख़ैराबादी

ये सर-ब-मोहर बोतलें हैं जो शराब की

रियाज़ ख़ैराबादी

ये कहाँ लगी ये कहाँ लगी जो क़फ़स से शोर-ए-फ़ुग़ाँ उठा

रियाज़ ख़ैराबादी

ये बला मेरे सर चढ़ी ही नहीं

रियाज़ ख़ैराबादी

थका ले और दौर-ए-आसमाँ तक

रियाज़ ख़ैराबादी

सुब्ह है रात कहाँ अब वो कहाँ रात की बात

रियाज़ ख़ैराबादी

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