सबसे Poetry (page 21)

रात दिन शाम-ओ-सहर सब एक रंग

सुल्तान शाहिद

मैं अब्र-ओ-बाद से तूफ़ाँ से सब से डरता हूँ

सुलतान रशक

उस की जानिब देखते थे और सब ख़ामोश थे

सुलतान रशक

लिख रहा हूँ हर्फ़-ए-हक़ हर्फ़-ए-वफ़ा किस के लिए

सुलतान रशक

जाने क्यूँ बातों से जलते हैं गिले करते हैं लोग

सुलतान रशक

वही बे-सबब से निशाँ हर तरफ़

सुल्तान अख़्तर

रक़्स-ए-ताऊस-ए-तमन्ना नहीं होने वाला

सुल्तान अख़्तर

ख़ाक उड़ती है ख़रीदार कहाँ खो गए हैं

सुल्तान अख़्तर

हरीफ़-ए-वक़्त हूँ सब से जुदा है राह मिरी

सुल्तान अख़्तर

बराए नाम सही दिन के हाथ पीले हैं

सुल्तान अख़्तर

बराए नाम सही दिन के हाथ पीले हैं

सुल्तान अख़्तर

क्यूँ मेरे दुख चुनते हो

सुलेमान ख़ुमार

कोई दिया किसी चौखट पे अब न जलने का

सुलेमान ख़ुमार

इस एक सोच में गुम हैं ख़याल जितने हैं

सुलेमान ख़ुमार

प्यार का दर्द का मज़हब नहीं होता कोई

सुलैमान अरीब

निज़ाम-ए-शम्स-ओ-क़मर कितने दस्त-ए-ख़ाक में हैं

सुलैमान अरीब

हिसाब-ए-उम्र करो या हिसाब-ए-जाम करो

सुलैमान अरीब

ग़म-कदे वो जो तिरे गाम से जल उठते हैं

सुलैमान अरीब

तुझे क्या हुआ है बता ऐ दिल न सुकून है न क़रार है

सुलैमान अहमद मानी

क्यूँ और ज़ख़्म सीने पे खाओ हो दोस्तो

सुलैमान अहमद मानी

कहाँ तेवर हैं उन में अब वो कल के

सुहैल काकोरवी

इस ज़मीन ओ आसमाँ पर ख़ाक डाल

सुहैल अख़्तर

सब तमाशे हो चुके अब घर चलो

सुहैल अहमद ज़ैदी

मैं क्या करूँ कोई सब मेरे इख़्तियार में है

सुहैल अहमद ज़ैदी

आँखों को मयस्सर कोई मंज़र ही नहीं था

सुहैल अहमद ज़ैदी

ज़र्द-चमेली

सूफ़िया अनजुम ताज

बहार का क़र्ज़

सूफ़िया अनजुम ताज

ऐ हमराज़

सूफ़िया अनजुम ताज

आज 'तबस्सुम' सब के लब पर

सूफ़ी तबस्सुम

निगाहें दर पे लगी हैं उदास बैठे हैं

सूफ़ी तबस्सुम

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