सबसे Poetry (page 22)

क्या हुआ जो सितारे चमकते नहीं दाग़ दिल के फ़रोज़ाँ करो दोस्तो

सूफ़ी तबस्सुम

किस ने ग़म के जाल बिखेरे

सूफ़ी तबस्सुम

ऐसे भी थे कुछ हालात

सूफ़ी तबस्सुम

आँखें खुली थीं सब की कोई देखता न था

सूफ़ी तबस्सुम

याद आती है तिरी यूँ मिरे ग़म-ख़ाने में

सुदर्शन कुमार वुग्गल

समझते हैं जो कमतर हर किसी को

सुदर्शन कुमार वुग्गल

इन्द्र-धनुष बन जाएँ

सुबोध लाल साक़ी

डोर

सुबोध लाल साक़ी

ये भी हुआ कि फ़ाइलों के दरमियाँ मिलीं

सुबोध लाल साक़ी

लम्बी ख़ामोशी की साज़िश को हराए कोई

सुबोध लाल साक़ी

मुझे तो मोहब्बत से इंकार होगा

सुभाष पाठक ज़िया

मुझे मलाल में रखना ख़ुशी तुम्हारी थी

सुबहान असद

आज है कुछ सबब आज की शब न जा

सुबहान असद

फूल सब के लिए महकते हैं

सोनरूपा विशाल

ख़ुशनुमा पल की गिरफ़्तारी करें

सोनरूपा विशाल

एक इक क़तरा जोड़ कर रक्खा

सोनरूपा विशाल

अपनी नज़रों में हारना कब तक

सोनरूपा विशाल

सुलगते दश्त का मंज़र हुई हैं

सिया सचदेव

दर-हक़ीक़त रोज़-ओ-शब की तल्ख़ियाँ जाती रहीं

सिया सचदेव

आरज़ूओं को अना-गीर नहीं कर सकते

सिया सचदेव

मौसम-ए-गुल तिरे इनआ'म अभी बाक़ी हैं

सिराजुद्दीन ज़फ़र

और खुल जा कि मआ'रिफ़ की गुज़रगाहों में

सिराजुद्दीन ज़फ़र

ये एक लड़ी के सब छिटके हुए मोती हैं

सिराज लखनवी

मिटा सा हर्फ़ हूँ बिगड़ी हुई सी बात हूँ मैं

सिराज लखनवी

ईमाँ की नुमाइश है सज्दे हैं कि अफ़्साने

सिराज लखनवी

अब इतनी अर्ज़ां नहीं बहारें वो आलम-ए-रंग-ओ-बू कहाँ है

सिराज लखनवी

आँखों में आज आँसू फिर डबडबा रहे हैं

सिराज लखनवी

ज़ि-बस काफ़िर-अदायों ने चलाए संग-ए-बे-रहमी

सिराज औरंगाबादी

हिरन सब हैं बराती और दिवाना बन का दूल्हा है

सिराज औरंगाबादी

यार को बे-हिजाब देखा हूँ

सिराज औरंगाबादी

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