सदा Poetry (page 28)
किसी ने बा-वफ़ा समझा किसी ने बेवफ़ा समझा
डी. राज कँवल
बात कहने के लिए बात बनाई न गई
चरख़ चिन्योटी
बात कहने के लिए बात बनाई न गई
चरख़ चिन्योटी
दिल में है तलब और दुआ और तरह की
बुशरा एजाज़
आज़ार-ओ-जफ़ा-ए-पैहम से उल्फ़त में जिन्हें आराम नहीं
बिस्मिल इलाहाबादी
कोई आहट कोई सरगोशी सदा कुछ भी नहीं
बिलक़ीस ज़फ़ीरुल हसन
दीवार-ए-काबा 19 नवम्बर 1989
बिलाल अहमद
दिल आतिश-ए-हिज्राँ से जलाना नहीं अच्छा
भारतेंदु हरिश्चंद्र
बुत-ए-काफ़िर जो तू मुझ से ख़फ़ा है
भारतेंदु हरिश्चंद्र
असीरान-ए-क़फ़स सेहन-ए-चमन को याद करते हैं
भारतेंदु हरिश्चंद्र
मैं क्या बताऊँ कैसी परेशानियों में हूँ
भारत भूषण पन्त
लाख टकराते फिरें हम सर दर-ओ-दीवार से
भारत भूषण पन्त
कुछ न कुछ सिलसिला ही बन जाता
भारत भूषण पन्त
दीद की तमन्ना में आँख भर के रोए थे
भारत भूषण पन्त
चाहतों के ख़्वाब की ताबीर थी बिल्कुल अलग
भारत भूषण पन्त
अंधेरा मिटता नहीं है मिटाना पड़ता है
भारत भूषण पन्त
उन को बुत समझा था या उन को ख़ुदा समझा था मैं
बहज़ाद लखनवी
ये साक़ी की करामत है कि फ़ैज़-ए-मय-परस्ती है
बेदम शाह वारसी
सहारा मौजों का ले ले के बढ़ रहा हूँ मैं
बेदम शाह वारसी
सुब्ह क़यामत आएगी कोई न कह सका कि यूँ
बयान मेरठी
मिस्ल-ए-हुबाब-ए-बहर न इतना उछल के चल
बयान मेरठी
खुला है जल्वा-ए-पिन्हाँ से अज़-बस चाक वहशत का
बयान मेरठी
इस बहर-ए-बे-सदा में कुछ और नीचे जाएँ
बशीर सैफ़ी
ऐसा लगता है मुख़ालिफ़ है ख़ुदाई मेरी
बशीर सैफ़ी
फूल बरसे कहीं शबनम कहीं गौहर बरसे
बशीर बद्र
या मह-ओ-साल की दीवार गिरा दी जाए
बशीर अहमद बशीर
जुदा भी हो के वो इक पल कभी जुदा न हुआ
बशीर अहमद बशीर
रंग से पैरहन-ए-सादा हिनाई हो जाए
मिर्ज़ा रज़ा बर्क़
वक़्त रस्ते में खड़ा है कि नहीं
बाक़ी सिद्दीक़ी
तुम कब थे क़रीब इतने मैं कब दूर रहा हूँ
बाक़ी सिद्दीक़ी
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