सदा Poetry (page 29)

तिरी निगाह का अंदाज़ क्या नज़र आया

बाक़ी सिद्दीक़ी

रस्म-ए-सज्दा भी उठा दी हम ने

बाक़ी सिद्दीक़ी

जुनूँ की राख से मंज़िल में रंग क्या आए

बाक़ी सिद्दीक़ी

इस बज़्म में पूछे न कोई मुझ से कि क्या हूँ

बक़ा उल्लाह 'बक़ा'

चले तो जाते हो रूठे हुए मगर सुन लो

बाक़र मेहदी

किसी पे कोई भरोसा करे तो कैसे करे

बाक़र मेहदी

दश्त-ए-वफ़ा में ठोकरें खाने का शौक़ था

बाक़र मेहदी

एक पुर-असरार सदा

बलराज कोमल

इतना न अपने जामे से बाहर निकल के चल

ज़फ़र

बाग़-ए-दिल में कोई ग़ुंचा न खिला तेरे बा'द

बदनाम नज़र

तारीक उजालों में बे-ख़्वाब नहीं रहना

अज़रा वहीद

गिरे क़तरों में पत्थर पर सदा ऐसा भी होता है

अज़रा वहीद

मैं ने चुप के अंधेरे में ख़ुद को रखा इक फ़ज़ा के लिए

अज़्म बहज़ाद

दहर में इक तिरे सिवा क्या है

अज़ीज़ तमन्नाई

रसूल-ए-काज़िब

अज़ीज़ क़ैसी

मिटा के अंजुमन-ए-आरज़ू सदा दी है

अज़ीज़ क़ैसी

आह-ए-बे-असर निकली नाला ना-रसा निकला

अज़ीज़ क़ैसी

मोजज़े का दर खुला और इक असा रौशन हुआ

अज़ीज़ नबील

इस गुफ़्तुगू से यूँ तो कोई मुद्दआ नहीं

अज़ीज़ हामिद मदनी

मैं भी साहिल की तरह टूट के बह जाती हूँ

अज़ीज़ बानो दाराब वफ़ा

इस रास्ते में जब कोई साया न पाएगा

अज़हर इनायती

शहर को आतिश-ए-रंजिश के धुआँ तक देखूँ

अज़हर हाश्मी

ऐसे पामाल कि पहचान में आते ही नहीं

अज़हर अब्बास

बक़ा-ए-दवाम का मुसाफ़िर

अज़ीम कुरेशी

ये फूल जो मिट्टी के हयूलों से अटा है

अज़ीम कुरेशी

समेट लो मुझे अपनी सदा के हल्क़ों में

आज़ाद गुलाटी

वो रूह के गुम्बद में सदा बन के मिलेगा

आज़ाद गुलाटी

वो जो किसी का रूप धार कर आया था

आज़ाद गुलाटी

मैं बिछड़ कर तुझ से तेरी रूह के पैकर में हूँ

आज़ाद गुलाटी

मैं अपने आप से इक खेल करने वाला हूँ

आज़ाद गुलाटी

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