सागर Poetry (page 9)

उतर रहा था समुंदर सराब के अंदर

शरीक़ अदील

पहुँच गया था वो कुछ इतना रौशनी के क़रीब

शारिब मौरान्वी

जो अपनी चश्म-ए-तर से दिल का पारा छोड़ जाता है

शारिब मौरान्वी

नग़्मगी से सुकूत बेहतर था

शरीफ़ मुनव्वर

अपने पस-मंज़र में मंज़र बोलते

शरर फ़तेह पुरी

बाद-ए-सरसर की करामात से पहले क्या था

शनावर इस्हाक़

रात शहर और उस के बच्चे

शम्सुर रहमान फ़ारूक़ी

माह-ए-मुनीर

शम्सुर रहमान फ़ारूक़ी

सजे हुए बाम-ओ-दर से आगे की सोचता हूँ

शमशीर हैदर

लफ़्ज़-ओ-मा'नी के समुंदर का सफ़र हैं कुछ लोग

शम्स रम्ज़ी

इस से पहले कि चराग़ों को वो बुझता देखे

शमीम रविश

हँसो न तुम रुख़-ए-दुश्मन जो ज़र्द है यारो

शमीम करहानी

किताब पढ़ते रहे और उदास होते रहे

शमीम हनफ़ी

हिज्र का क़िस्सा बहुत लम्बा नहीं बस रात भर है

शमीम हनफ़ी

हर नक़्श-ए-नवा लौट के जाने के लिए था

शमीम हनफ़ी

एक बेनाम-ओ-निशाँ रूह का पैकर हूँ मैं

शमीम हनफ़ी

दूर तक फैला हुआ है एक अन-जाना सा ख़ौफ़

शमीम फ़ारूक़ी

शर्मीली छूई-मूई अजब मोहनी सी थी

शमीम फ़ारूक़ी

डूबते सूरज का मंज़र वो सुहानी कश्तियाँ

शमीम फ़ारूक़ी

अँधेरी शब है कहाँ रूठ कर वो जाएगा

शमीम फ़ारूक़ी

जो चेहरे के बाहर है वो अंदर न मिलेगा

शमीम अनवर

कब शौक़ मिरा जज़्बे से बाहर न हुआ था

शाकिर ख़लीक़

ये दिल हर इक नई कोशिश पे यूँ धड़कता है

शकील ग्वालिआरी

जान की बारी है अब दिल का ज़ियाँ ऐसा न था

शकील ग्वालिआरी

सिंगापुर

शकील आज़मी

कुछ इस तरह से मिलें हम कि बात रह जाए

शकील आज़मी

रात के पिछले पहर

शकेब जलाली

समझ सको तो ये तिश्ना-लबी समुंदर है

शकेब जलाली

फिर सुन रहा हूँ गुज़रे ज़माने की चाप को

शकेब जलाली

क्या कहिए कि अब उस की सदा तक नहीं आती

शकेब जलाली

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