सागर Poetry (page 7)

यादश-ब-ख़ैर साया-फ़गन घर ही और था

सय्यद मज़हर जमील

अगर ये ज़िंदगी तन्हा नहीं होती

सय्यद काशिफ़ रज़ा

ख़ैर की नज़्र की है या शर की

सय्यद काशिफ़ रज़ा

रऊनतों में न इतनी भी इंतिहा हो जाए

सय्यद अारिफ़

डरता हूँ ज़िंदगी के वसीले नहीं मिले

सय्यद अारिफ़

एक जग बीत गया झूम के आए बादल

सय्यद अहमद शमीम

ये धूप गिरी है जो मिरे लॉन में आ कर

स्वप्निल तिवारी

तेरे मिलने का आख़िरी इम्कान

स्वप्निल तिवारी

नींद से आ कर बैठा है

स्वप्निल तिवारी

मुँह अँधेरे तेरी यादों से निकलना है मुझे

स्वप्निल तिवारी

दिन के पहले पहर में ही अपना बिस्तर छोड़ कर

स्वप्निल तिवारी

धीरे धीरे ढलते सूरज का सफ़र मेरा भी है

स्वप्निल तिवारी

चारों ओर समुंदर है

स्वप्निल तिवारी

हर लम्हा ज़िंदगी के पसीने से तंग हूँ

सूर्यभानु गुप्त

नहीं रहेगा हमेशा ग़ुबार मेरे लिए

सुरेन्द्र शजर

हर एक डूबता मंज़र दिखाई देता है

सुनील आफ़ताब

तुझ में सब मंज़र महफ़ूज़

सुलतान सुबहानी

नया हुक्म-नामा

सुलतान सुबहानी

लहू-रंग सय्याल रौशन भँवर

सुलतान सुबहानी

तेरी आँखों पे घने ख़्वाबों का पहरा हूँ मैं

सुलतान सुबहानी

जो कश्मकश थी तिरा इंतिज़ार करते हुए

सुलतान निज़ामी

जीने की तमन्ना है न मरने की तमन्ना

सुलतान निज़ामी

झिजक रहा हूँ उसे आश्कार करते हुए

सुलतान निज़ामी

तिलिस्म-ख़ाना-ए-दिल में है चार-सू रौशन

सुल्तान अख़्तर

तन्हाई की ख़लीज है यूँ दरमियान में

सुल्तान अख़्तर

दस्तार-ए-एहतियात बचा कर न आएगा

सुल्तान अख़्तर

दर-ब-दर की ख़ाक पेशानी पे मल कर आएगा

सुल्तान अख़्तर

मुद्दत हुई राहत भरा मंज़र नहीं उतरा

सुलेमान ख़ुमार

कल रात मेरे साथ अजब हादिसा हुआ

सुलेमान ख़ुमार

दश्त में ये जाँ-फ़ज़ाँ मंज़र कहाँ से आ गए

सुलेमान ख़ुमार

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