रेगिस्तान Poetry (page 10)

क्या ख़त्म न होगी कभी सहरा की हुकूमत

शोएब निज़ाम

टूटे हुए ख़्वाबों के तलबगार भी आए

शोएब निज़ाम

मेरे क़दमों पर निगूँ मेरा ही सर है भी तो क्या

शोएब निज़ाम

हैबत-ए-हुस्न से अल्फ़ाज़ की हैरानी तक

शोएब निज़ाम

गीली मिट्टी से बदन बनते हुए उम्र लगी

शमशाद शाद

ना-तवाँ इश्क़ ने आख़िर किया ऐसा हम को

शिबली नोमानी

वो जब तक अंजुमन में जल्वा फ़रमाने नहीं आते

शेर सिंह नाज़ देहलवी

आसमानों से उतर कर मिरी धरती पे बिराज

शेर अफ़ज़ल जाफ़री

लेते ही दिल जो आशिक़-ए-दिल-सोज़ का चले

ज़ौक़

मसअला हूँ मैं सदा से कम-निगाही के लिए

शहज़ाद रज़ा लम्स

कभी जंगल कभी सहरा कभी दरिया लिख्खा

शीन काफ़ निज़ाम

ख़ौफ़-ए-सहरा

शाज़ तमकनत

सुख़न राज़-ए-नशात-ओ-ग़म का पर्दा हो ही जाता है

शाज़ तमकनत

शिकन शिकन तिरी यादें हैं मेरे बिस्तर की

शाज़ तमकनत

कोई तो आ के रुला दे कि हँस रहा हूँ मैं

शाज़ तमकनत

कोई तन्हाई का एहसास दिलाता है मुझे

शाज़ तमकनत

कौन देता रहा सहरा में सदा मेरी तरह

शाज़ तमकनत

जाने क्या क़ीमत-ए-अरबाब-ए-वफ़ा ठहरेगी

शाज़ तमकनत

बिखरी थी हर सम्त जवानी रात घनेरी होने तक

शायान क़ुरैशी

बिखरे तो फिर बहम मिरे अज्ज़ा नहीं हुए

शाैकत वास्ती

बिखरे तो फिर बहम मिरे अज्ज़ा नहीं हुए

शाैकत वास्ती

काट कर जो राह का बूढ़ा शजर ले जाएगा

शर्मा तासीर

मुमकिन ही न थी ख़ुद से शनासाई यहाँ तक

शारिक़ कैफ़ी

कहीं न था वो दरिया जिस का साहिल था मैं

शारिक़ कैफ़ी

जो कहता है कि दरिया देख आया

शारिक़ कैफ़ी

बरसों जुनूँ सहरा सहरा भटकाता है

शारिक़ कैफ़ी

ख़्वाब ऐसा भी नज़र आया है अक्सर मुझ को

शारिक़ जमाल

मौज-ए-दरिया को पिएँ क्या ग़म-ए-ख़म्याज़ा करें

शम्सुर रहमान फ़ारूक़ी

मसल कर फेंक दूँ आँखें तो कुछ तनवीर हो पैदा

शम्सुर रहमान फ़ारूक़ी

कनार-ए-बहर है देखूँगा मौज-ए-आब में साँप

शम्सुर रहमान फ़ारूक़ी

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