रेगिस्तान Poetry (page 11)

ये अर्ज़-ओ-समा क़ुलज़ुम-ओ-सहरा मुतहर्रिक

शम्स रम्ज़ी

ये क्या अंदाज़ हैं दस्त-ए-जुनून-ए-फ़ित्ना-सामाँ के

शम्स इटावी

हुस्न की बिजलियाँ अल-अमाँ अल-अमाँ

शम्स इटावी

फ़ज़ा-ए-नम में सदाओं का शोर हो जाए

शमीम क़ासमी

समझे है मफ़्हूम नज़र का दिल का इशारा जाने है

शमीम करहानी

पी ले जो लहू दिल का वो इश्क़ की मस्ती है

शमीम करहानी

हँसो न तुम रुख़-ए-दुश्मन जो ज़र्द है यारो

शमीम करहानी

सूरज धीरे धीरे पिघला फिर तारों में ढलने लगा

शमीम हनफ़ी

शाम के साहिल पे सूरज का सफ़ीना आ लगा

शमीम हनफ़ी

क्यूँ परेशान हुआ जाता है दिल क्या जाने

शमीम हनफ़ी

कई रातों से बस इक शोर सा कुछ सर में रहता है

शमीम हनफ़ी

कभी सहरा में रहते हैं कभी पानी में रहते हैं

शमीम हनफ़ी

बंद कर ले खिड़कियाँ यूँ रात को बाहर न देख

शमीम हनफ़ी

बंद कर के खिड़कियाँ यूँ रात को बाहर न देख

शमीम हनफ़ी

अब क़ैस है कोई न कोई आबला-पा है

शमीम हनफ़ी

शाकी बद-ज़न आज़ुर्दा हैं मुझ से मेरे भाई यार

शमीम अब्बास

गर्द-ए-मजनूँ ले के शायद बाद-ए-सहरा जाए है

शकील जाज़िब

इक इक क़दम फ़रेब-ए-तमन्ना से बच के चल

शकील बदायुनी

शाइ'री रूह में तहलील नहीं हो पाती

शकील आज़मी

अपनी हस्ती को मिटा दूँ तिरे जैसा हो जाऊँ

शकील आज़मी

जहाँ तलक भी ये सहरा दिखाई देता है

शकेब जलाली

वही झुकी हुई बेलें वही दरीचा था

शकेब जलाली

वहाँ की रौशनियों ने भी ज़ुल्म ढाए बहुत

शकेब जलाली

तू ने क्या क्या न ऐ ज़िंदगी दश्त ओ दर में फिराया मुझे

शकेब जलाली

शफ़क़ जो रू-ए-सहर पर गुलाल मलने लगी

शकेब जलाली

साहिल तमाम अश्क-ए-नदामत से अट गया

शकेब जलाली

ख़मोशी बोल उठ्ठे हर नज़र पैग़ाम हो जाए

शकेब जलाली

जहाँ तलक भी ये सहरा दिखाई देता है

शकेब जलाली

ग़म-ए-उल्फ़त मिरे चेहरे से अयाँ क्यूँ न हुआ

शकेब जलाली

दश्त ओ सहरा अगर बसाए हैं

शकेब जलाली

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