रेगिस्तान Poetry (page 12)

बस इक शुआ-ए-नूर से साया सिमट गया

शकेब जलाली

तू न आया तिरी यादों की हवा तो आई

शकेब बनारसी

साथ ग़ुर्बत में कोई ग़ैर न अपना निकला

शकेब बनारसी

कुछ भी हो तक़दीर का लिक्खा बदल

शाइस्ता सहर

ख़ाक से उठना ख़ाक में सोना ख़ाक को बंदा भूल गया

शाइस्ता मुफ़्ती

ऐ ख़िरद-मंदो मुबारक हो तुम्हें फ़र्ज़ानगी

शैख़ ज़हूरूद्दीन हातिम

इश्क़ के शहर की कुछ आब-ओ-हवा और ही है

शैख़ ज़हूरूद्दीन हातिम

किस हक़ीक़त का इंकिशाफ़ किया

शहज़ाद नय्यर

हर एक गाम पे सदियाँ निसार करते हुए

शहज़ाद नय्यर

सहर ने साँस ली सूरज चमकने वाला था

शहज़ाद हुसैन साइल

मुसाफ़िर हो तो सुन लो राह में सहरा भी आता है

शहज़ाद अहमद

अब जहाँ मैं हूँ वहाँ मेरे सिवा कुछ भी नहीं

शहज़ाद अहमद

रूह की आग

शहज़ाद अहमद

कमरों में छुपने के दिन हैं और न बरहना रातें हैं

शहज़ाद अहमद

दरिया कभी इक हाल में बहता न रहेगा

शहज़ाद अहमद

फ़रेब-दर-फ़रेब

शहरयार

शम-ए-दिल शम-ए-तमन्ना न जला मान भी जा

शहरयार

शदीद प्यास थी फिर भी छुआ न पानी को

शहरयार

नहीं रोक सकोगे जिस्म की इन परवाजों को

शहरयार

किस किस तरह से मुझ को न रुस्वा किया गया

शहरयार

नदी थी कश्तियाँ थीं चाँदनी थी झरना था

शहराम सर्मदी

अगली रुत की नमाज़

शहनाज़ नबी

मिरी तरह से कहीं ख़ाक छानता होगा

शहनाज़ मुज़म्मिल

याद के शहर मिरी जाँ से गुज़र

शाहिदा तबस्सुम

हवाएँ चाँदनी में काँपती हैं

शाहिदा तबस्सुम

रात सी नींद है महताब उतारा जाए

शाहिद ज़की

ऐ ख़ुदा रेत के सहरा को समुंदर कर दे

शाहिद मीर

रात ऐसी कि कभी जिस का सवेरा न हुआ

शाहिद माहुली

भटक रही है अंधेरों में आँख देखे क्या

शाहिद माहुली

दूर सहरा में जहाँ धूप शजर रखती है

शाहिद लतीफ़

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