रेगिस्तान Poetry (page 17)

ख़ून फिर ख़ून है

साहिर लुधियानवी

दिल वो सहरा है कि जिस में रात दिन

साहिर होशियारपुरी

सदा-ए-जावेदाँ

साहिर होशियारपुरी

ग़म का सहरा न मिला दर्द का दरिया न मिला

साहिर होशियारपुरी

कल तलक सहरा बसा था आँख में

साहिल अहमद

धूप थी साया उठा कर रख दिया

साहिल अहमद

बंद आँखें करूँ और ख़्वाब तुम्हारे देखूँ

साहिबा शहरयार

एक मैं हूँ एक तू है बा-ख़बर कोई नहीं

सहबा वहीद

एक मैं हूँ एक तू है बा-ख़बर कोई नहीं

सहबा वहीद

जिसे लिख लिख के ख़ुद भी रो पड़ा हूँ

सहबा अख़्तर

जिसे लिख लिख के ख़ुद भी रो पड़ा हूँ

सहबा अख़्तर

दोहराऊँ क्या फ़साना-ए-ख़्वाब-ओ-ख़याल को

सहबा अख़्तर

तंग आते भी नहीं कशमकश-ए-दहर से लोग

सहर अंसारी

रास्तों में इक नगर आबाद है

सहर अंसारी

रास्तों में इक नगर आबाद है

सहर अंसारी

हम ने आदाब-ए-ग़म का पास किया

सहर अंसारी

इक शरार-ए-गिरफ़्ता-रंग हूँ मैं

सहर अंसारी

इक आस का धुँदला साया है इक पास का तपता सहरा है

सहर अंसारी

वो हक़ीक़त में एक लम्हा था

सग़ीर मलाल

निकल गए थे जो सहरा में अपने इतनी दूर

सग़ीर मलाल

न जाने क्यूँ सदा होता है एक सा अंजाम

सग़ीर मलाल

जिस को तय कर न सके आदमी सहरा है वही

सग़ीर मलाल

एक रहने से यहाँ वो मावरा कैसे हुआ

सग़ीर मलाल

हम आँखों से भी अर्ज़-ए-तमन्ना नहीं करते

साग़र निज़ामी

सूने ही रहे हिज्र के सहरा उसे कहना

सफ़दर सलीम सियाल

चारों ओर अब फूल ही फूल हैं क्या गिनते हो दाग़ों को

सफ़दर मीर

नज़्म

सईदुद्दीन

अजब मौजूदगी है जो कमी पर मुश्तमिल है

सईद शरीक़

ये हादसा भी तो कुछ कम न था सबा के लिए

सईद अहमद अख़्तर

ज़ात की काल कोठरी से आख़िरी नश्रिया

सईद अहमद

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