रेगिस्तान Poetry (page 18)

हम ज़ात से हम कलामी और फ़िराक़

सईद अहमद

इक बर्ग-ए-ख़ुश्क से गुल-ए-ताज़ा तक आ गए

सईद अहमद

चौधवाँ उस चंदर का साल हुआ

सदरुद्दीन मोहम्मद फ़ाएज़

नहीं मा'लूम जीने का हुनर कैसा रखा है

सादिया सफ़दर सादी

क्यूँ भटकती सहरा में घर भी इक ख़राबा था

सादिया रोशन सिद्दीक़ी

वो जिस का रंग सलोना है बादलों की तरह

सादिक़ नसीम

सुकूत-ए-मर्ग में क्यूँ राह-ए-नग़्मा-गर देखूँ

सादिक़ नसीम

जो लब पे न लाऊँ वही शे'रों में कहूँ मैं

सादिक़ नसीम

इस एहतिमाम से परवाने पेशतर न जले

सादिक़ नसीम

अपनी आँखों से तो दरिया भी सराब-आसा मिले

सादिक़ नसीम

दरवाज़े को पीट रहा हूँ पैहम चीख़ रहा हूँ

सादिक़

छाने होंगे सहरा जिस ने वो ही जान सका होगा

साबिर ज़फ़र

अपनी यकजाई में भी ख़ुद से जुदा रहता हूँ

साबिर ज़फ़र

ये महर ओ मह बे-चराग़ ऐसे कि राख बन कर बिखर रहे हैं

साबिर वसीम

उस जंगल से जब गुज़रोगे तो एक शिवाला आएगा

साबिर वसीम

पलकों पर नम क्या फैल गया

साबिर वसीम

मिरे ध्यान में है इक महल कहीं चौबारों का

साबिर वसीम

इक आग देखता था और जल रहा था मैं

साबिर वसीम

अजनबी

साबिर दत्त

कैसी मअनी की क़बा रिश्तों को पहनाई गई

साबिर अदीब

जो भी होगा वार देखा जाएगा

सबीहा सबा, पाकिस्तान

ग़मों से अपने कोई शख़्स चूर होता है

सबीहा सबा, पाकिस्तान

जहाँ में जिस की शोहरत कू-ब-कू है

सबीला इनाम सिद्दीक़ी

आँखों में वो आएँ तो हँसाते हैं मुझे ख़्वाब

सबीला इनाम सिद्दीक़ी

यगाना बन के हो जाए वो बेगाना तो क्या होगा

सबा अकबराबादी

होश-ओ-ख़िरद से दूर हूँ सूद-ओ-ज़ियाँ से दूर

सबा अफ़ग़ानी

था निगाहों में बसाया जाने किस तस्वीर को

रिज़वानूरर्ज़ा रिज़वान

वीरान ख़्वाहिश

रियाज़ लतीफ़

ग़ैबी दुनियाओं से तन्हा क्यूँ आता है

रियाज़ लतीफ़

इस से अच्छे दश्त-ए-सहरा इस से अच्छे गर्द-बाद

रियाज़ ख़ैराबादी

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