रात Poetry (page 15)

सुख़न की शब लहू होती रहेगी

सय्यद अमीन अशरफ़

शौक़-ए-वारफ़्ता को मलहूज़-ए-अदब भी होगा

सय्यद अमीन अशरफ़

न जाने जाए कहाँ तक ये सिलसिला दिल का

सय्यद अमीन अशरफ़

किसी ख़याल की रौ में था मुस्कुराते हुए

सय्यद अमीन अशरफ़

है किस के लिए लुत्फ़ ग़ज़ब किस के लिए है

सय्यद अमीन अशरफ़

है इर्तिबात-शिकन दाएरों में बट जाना

सय्यद अमीन अशरफ़

दरख़्शाँ हो जो वो मह-ज़ादा-ए-शब

सय्यद अमीन अशरफ़

उतर के धूप जब आएगी शब के ज़ीने से

सय्यद अहमद शमीम

कट गई रात सुब्ह होती है

सय्यद अाग़ा अली महर

बे-जुर्म-ओ-बेगुनाह ग़रीब-उल-वतन किया

सय्यद अाग़ा अली महर

यही था वक़्फ़ तिरी महफ़िल-ए-तरब के लिए

सय्यद आबिद अली आबिद

किसी की इश्वा-गरी से ब-ग़ैर-ए-फ़स्ल-ए-बहार

सय्यद आबिद अली आबिद

गर्दिश-ए-जाम नहीं रुक सकती

सय्यद आबिद अली आबिद

दिन ढला शाम हुई फूल कहीं लहराए

सय्यद आबिद अली आबिद

आम हो फ़ैज़-ए-बहाराँ तो मज़ा आ जाए

सय्यद आबिद अली आबिद

ये धूप गिरी है जो मिरे लॉन में आ कर

स्वप्निल तिवारी

समाअतों में बहुत दूर की सदा ले कर

स्वप्निल तिवारी

मेरे होंटों को छुआ चाहती है

स्वप्निल तिवारी

मिरे घर में न होगी रौशनी क्या

स्वप्निल तिवारी

धूप के भीतर छुप कर निकली

स्वप्निल तिवारी

धीरे धीरे ढलते सूरज का सफ़र मेरा भी है

स्वप्निल तिवारी

सती

सुरूर जहानाबादी

किसी मस्त-ए-ख़्वाब का है अबस इंतिज़ार सो जा

सुरूर जहानाबादी

ब-ख़ुदा इश्क़ का आज़ार बुरा होता है

सुरूर जहानाबादी

ख़्वाब देखता हूँ

सुरूर बाराबंकवी

तू उरूस-ए-शाम-ए-ख़याल भी तू जमाल-ए-रू-ए-सहर भी है

सुरूर बाराबंकवी

तू उरूस-ए-शाम-ए-ख़याल भी तो जमाल-ए-रू-ए-सहर भी है

सुरूर बाराबंकवी

न किसी को फ़िक्र-ए-मंज़िल न कहीं सुराग़-ए-जादा

सुरूर बाराबंकवी

मेहर-ओ-माह भी लर्ज़ां हैं फ़ज़ा की बाँहों में

सुरूर बाराबंकवी

कहे तो कौन कहे सरगुज़श्त-ए-आख़िर-ए-शब

सुरूर बाराबंकवी

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