रात Poetry (page 17)

सुकून-ए-क़ल्ब ओ शकेब-ए-नज़र की बात करो

सूफ़ी तबस्सुम

जब अश्क तिरी याद में आँखों से ढले हैं

सूफ़ी तबस्सुम

याद आती है तिरी यूँ मिरे ग़म-ख़ाने में

सुदर्शन कुमार वुग्गल

सीलन

सुबोध लाल साक़ी

चुनाव

सुबोध लाल साक़ी

आज है कुछ सबब आज की शब न जा

सुबहान असद

वफ़ाओं के इरादे वुसअ'त-ए-मंज़िल में रहते हैं

सोज़ बरेलवी

सुलगते दश्त का मंज़र हुई हैं

सिया सचदेव

रंज इतने मिले ज़माने से

सिया सचदेव

दर-हक़ीक़त रोज़-ओ-शब की तल्ख़ियाँ जाती रहीं

सिया सचदेव

उठो ज़माने के आशोब का इज़ाला करें

सिराजुद्दीन ज़फ़र

मौसम-ए-गुल तिरे इनआ'म अभी बाक़ी हैं

सिराजुद्दीन ज़फ़र

इस्लाह-ए-अहल-ए-होश का यारा नहीं हमें

सिराजुद्दीन ज़फ़र

हम आहुवान-ए-शब का भरम खोलते रहे

सिराजुद्दीन ज़फ़र

दिन को बहर-ओ-बर का सीना चीर कर रख दीजिए

सिराजुद्दीन ज़फ़र

और खुल जा कि मआ'रिफ़ की गुज़रगाहों में

सिराजुद्दीन ज़फ़र

रात भर शम्अ जलाता हूँ बुझाता हूँ 'सिराज'

सिराज लखनवी

रात भर शम्अ' जलाता हूँ बुझाता हूँ 'सिराज'

सिराज लखनवी

जो अश्क सुर्ख़ है नामा-निगार है दिल का

सिराज लखनवी

हर अश्क-ए-सुर्ख़ है दामान-ए-शब में आग का फूल

सिराज लखनवी

निगाह-ए-यार यूँही और चंद पैमाने

सिराज लखनवी

वस्ल के दिन शब-ए-हिज्राँ की हक़ीक़त मत पूछ

सिराज औरंगाबादी

या-रब कहाँ गया है वो सर्व-ए-शोख़-रा'ना

सिराज औरंगाबादी

यार जब पेश-ए-नज़र होता है

सिराज औरंगाबादी

तुझ पर फ़िदा हैं सारे हुस्न-ओ-जमाल वाले

सिराज औरंगाबादी

शर्बत-ए-वस्ल पिला जा लब-ए-शीरीं की क़सम

सिराज औरंगाबादी

मुस्कुरा कर आशिक़ों पर मेहरबानी कीजिए

सिराज औरंगाबादी

मिरा दिल नहीं है मेरे हात तुम बिन

सिराज औरंगाबादी

क्यूँ तिरे गेसू कूँ गेसू बोलनाँ

सिराज औरंगाबादी

जो तुझे देख के मबहूत हुआ

सिराज औरंगाबादी

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