शोर Poetry (page 6)

दिल में रह रह के शोर उठता है

सिरज़ अालम ज़ख़मी

न पूछ मर्ग-ए-शनासाई का सबब क्या है

सिद्दीक़ मुजीबी

झोंका नफ़स का मौजा-ए-सरसर लगा मुझे

सिद्दीक़ अफ़ग़ानी

जब खुले मुट्ठी तो सब पढ़ लें ख़त-ए-तक़्दीर को

सिद्दीक़ अफ़ग़ानी

जलते जलते बुझ गई इक मोम-बत्ती रात को

सिब्त अली सबा

दूसरी बातों में हम को हो गया घाटा बहुत

शुजा ख़ावर

बिछड़ गए थे किसी रोज़ खेल खेल में हम

शोज़ेब काशिर

हम शहर में इक शम्अ की ख़ातिर हुए बर्बाद

शोहरत बुख़ारी

यहाँ रहने में दुश्वारी बहुत है

शोएब निज़ाम

हिजाब-ए-राज़ फ़ैज़-ए-मुर्शिद-ए-कामिल से उठता है

शेर सिंह नाज़ देहलवी

नाला इस शोर से क्यूँ मेरा दुहाई देता

ज़ौक़

महफ़िल में शोर-ए-क़ुलक़ुल-ए-मीना-ए-मुल हुआ

ज़ौक़

तंग थी जा ख़ातिर-ए-नाशाद में

मुस्तफ़ा ख़ाँ शेफ़्ता

दिल का गिला फ़लक की शिकायत यहाँ नहीं

मुस्तफ़ा ख़ाँ शेफ़्ता

इक साएँ साएँ घेरे है गिरते मकान को

शीन काफ़ निज़ाम

तमाशा

शाज़ तमकनत

रतजगा

शाज़ तमकनत

ज़ुल्फ़-ए-दराज़ से ये नुमायाँ है ग़ालिबन

शौक़ बहराइची

अचानक भीड़ का ख़ामोश हो जाना

शारिक़ कैफ़ी

देख न पाया जिस पैकर को वादों की अँगनाई में

शारिक़ जमाल

शोर थमने के बाद

शम्सुर रहमान फ़ारूक़ी

जब तक तुझ को मौत न आए कर ले रैन-बसेरा बाबा

शम्स रम्ज़ी

कमरे की दीवारों पर आवेज़ां जो तस्वीरें हैं

शम्स फ़र्रुख़ाबादी

फ़ज़ा-ए-नम में सदाओं का शोर हो जाए

शमीम क़ासमी

वो एक शोर सा ज़िंदाँ में रात-भर क्या था

शमीम हनफ़ी

ये रिश्ता-ए-जाँ मेरी तबाही का सबब है

शमीम हनफ़ी

वो एक शोर सा ज़िंदाँ में रात भर क्या था

शमीम हनफ़ी

कई रातों से बस इक शोर सा कुछ सर में रहता है

शमीम हनफ़ी

हर नक़्श-ए-नवा लौट के जाने के लिए था

शमीम हनफ़ी

जाते कहाँ जुनून के तूफ़ाँ में आ गए

शाकिर इनायती

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