सोच Poetry (page 18)

जाने क्या सोच के घर तक पहुँचा

बक़ा बलूच

तर्सील

बलराज कोमल

शायद

बलराज कोमल

जिगर के टुकड़े हुए जल के दिल कबाब हुआ

ज़फ़र

अब आँख भी मश्शाक़ हुई ज़ेर-ओ-ज़बर की

अज़रा परवीन

सफ़र के ब'अद भी सफ़र का एहतिमाम कर रहा हूँ मैं

अज़लान शाह

याद

अज़ीज़ तमन्नाई

हर आईना इक अक्स-ए-नौ ढूँडता है

अज़ीज़ तमन्नाई

कावाक

अज़ीज़ क़ैसी

बाक़ीस्त शब-ए-फ़ित्ना

अज़ीज़ क़ैसी

मिरा सवाल है ऐ क़ातिलान-ए-शब तुम से

अज़ीज़ नबील

मैं दस्तरस से तुम्हारी निकल भी सकता हूँ

अज़ीज़ नबील

तिरी कोशिश हम ऐ दिल सई-ए-ला-हासिल समझते हैं

अज़ीज़ लखनवी

मैं ने ये सोच के बोए नहीं ख़्वाबों के दरख़्त

अज़ीज़ बानो दाराब वफ़ा

एक दिए ने सदियों क्या क्या देखा है बतलाए कौन

अज़ीज़ बानो दाराब वफ़ा

अपनी बीती हुई रंगीन जवानी देगा

अज़ीज़ बानो दाराब वफ़ा

अटूट अंग

अज़हर गौरी

जब भी चाहूँ तेरा चेहरा सोच सकूँ

अज़हर अदीब

पत्ता हूँ आँधियों के मुक़ाबिल खड़ा हूँ मैं

अज़हर अदीब

कल परदेस में याद आएगी ध्यान में रख

अज़हर अदीब

दर टूटने लगे कभी दीवार गिर पड़े

अज़हर अदीब

लाई न सबा बू-ए-चमन अब के बरस भी

अज़ीम मुर्तज़ा

मैं अपने आप से इक खेल करने वाला हूँ

आज़ाद गुलाटी

आने वाले हादसों के ख़ौफ़ से सहमे हुए

आज़ाद गुलाटी

सोचों में लहू उछालते हैं

अय्यूब ख़ावर

लहरों में बदन उछालते हैं

अय्यूब ख़ावर

घर दरवाज़े से दूरी पर सात समुंदर बीच

अय्यूब ख़ावर

अब कोई और मुसीबत तो न पाली जाए

औरंगज़ेब

जीना है तो जीने का सहारा भी तो होगा

अतहर राज़

अल्फ़ाज़ न दे पाएँ अगर साथ बयाँ का

अतीक़ मुज़फ़्फ़रपुरी

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