सुबह की सुबह Poetry (page 12)

ग़ुंचा ग़ुंचा मौसम-ए-रंग-ए-अदा में क़ैद था

शाहीन बद्र

नक़्श था और नाम था ही नहीं

शाहीन अब्बास

ऐसा नहीं कि उस ने बनाया नहीं मुझे

शाहीन अब्बास

आँखों से यूँ चराग़ों में डाली है रौशनी

शाहीन अब्बास

मुश्किल तो न था ऐसा भी अफ़्लाक से रिश्ता

शहबाज़ ख़्वाजा

उफ़क़ पे

शहाब सर्मदी

तलाश

शहाब जाफ़री

तिरे ही नाम की सिमरण है मुझ को और तस्बीह

शाह नसीर

पिस्ताँ को तेरे देख के मिट जाए फिर हुबाब

शाह नसीर

कोई ये शैख़ से पूछे कि बंद कर आँखें

शाह नसीर

हम वो फ़लक हैं अहल-ए-तवक्कुल कि मिस्ल-ए-माह

शाह नसीर

चमन में ग़ुंचा मुँह खोले है जब कुछ दिल की कहने को

शाह नसीर

ज़ुल्फ़ छुटती तिरे रुख़ पर तो दिल अपना फिरता

शाह नसीर

तिरे है ज़ुल्फ़ ओ रुख़ की दीद सुब्ह-ओ-शाम आशिक़ का

शाह नसीर

लिया न हाथ से जिस ने सलाम आशिक़ का

शाह नसीर

क्यूँ न कहें बशर को हम आतिश-ओ-आब ओ ख़ाक-ओ-बाद

शाह नसीर

ख़ानदान-ए-क़ैस का मैं तो सदा से पीर हूँ

शाह नसीर

कर के आज़ाद हर इक शहपर-ए-बुलबुल कतरा

शाह नसीर

हुआ अश्क-ए-गुलगूँ बहार-ए-गरेबाँ

शाह नसीर

हार बना इन पारा-ए-दिल का माँग न गजरा फूलों का

शाह नसीर

दिखा दो गर माँग अपनी शब को तो हश्र बरपा हो कहकशाँ पर

शाह नसीर

शक़ आफ़ियत-कनार किनारे को कर गई

शफ़क़त तनवीर मिर्ज़ा

दोस्त या दुश्मन-ए-जाँ कुछ भी तुम अब बन जाओ

शफ़ीक़ ख़लिश

कली पर मुस्कुराहट आज भी मालूम होती है

शफ़ीक़ जौनपुरी

जैसे सुब्ह को सूरज निकले शाम ढले छुप जाए है

शफ़ीक़ देहलवी

कुछ सबील-ए-रिज़्क़ हो फिर कहीं मकाँ भी हो

शफ़क़ सुपुरी

जवानी से ज़ियादा वक़्त-ए-पीरी जोश होता है

शाद लखनवी

वो मय-परस्त हूँ बदली न जब नज़र आई

शाद लखनवी

कहते हैं नाला-ए-हज़ीं सुन के

शाद लखनवी

हस्ती-ओ-अदम में नफ़स-ए-चंद बशर के

शाद लखनवी

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