सुबह की सुबह Poetry (page 9)

रिंद-ए-ख़राब-हाल को ज़ाहिद न छेड़ तू

ज़ौक़

मज़ा था हम को जो लैला से दू-ब-दू करते

ज़ौक़

लेते ही दिल जो आशिक़-ए-दिल-सोज़ का चले

ज़ौक़

कौन वक़्त ऐ वाए गुज़रा जी को घबराते हुए

ज़ौक़

हंगामा गर्म हस्ती-ए-ना-पाएदार का

ज़ौक़

ऐ 'ज़ौक़' वक़्त नाले के रख ले जिगर पे हाथ

ज़ौक़

आँखें मिरी तलवों से वो मिल जाए तो अच्छा

ज़ौक़

दम न निकला यार की ना-मेहरबानी देख कर

शैख़ अली बख़्श बीमार

हम ज़िंदगी-शनास थे सब से जुदा रहे

शहपर रसूल

उठ सुब्ह हुई मुर्ग़-ए-चमन नग़्मा-सरा देख

मुस्तफ़ा ख़ाँ शेफ़्ता

था ग़ैर का जो रंज-ए-जुदाई तमाम शब

मुस्तफ़ा ख़ाँ शेफ़्ता

नज़्म

शीरीं अहमद

संग-आबाद की एक दुकाँ

शाज़ तमकनत

मेरी वहशत का तिरे शहर में चर्चा होगा

शाज़ तमकनत

भागे अच्छी शक्लों वाले इश्क़ है गोया काम बुरा

शौक़ क़िदवाई

शब-हाए-ऐश का वो ज़माना किधर गया

शौक़ देहलवी मक्की

आँसू मिरी आँखों से टपक जाए तो क्या हो

शौक़ बहराइची

उस के नाम

शौकत परदेसी

पलट के दौर-ए-ज़माँ सुब्ह-ओ-शाम पैदा कर

शातिर हकीमी

यक़ीन के ख़िलाफ़

शारिक़ कैफ़ी

अपनी रूदाद कहूँ या ग़म-ए-दुनिया लिक्खूँ

शरर फ़तेह पुरी

आख़िरी तमाशाई

शम्सुर रहमान फ़ारूक़ी

चाँद तारों ने भी जब रख़्त-ए-सफ़र खोला है

शम्स फ़र्रुख़ाबादी

सितारा टूट के बिखरा और इक जहान खुला

शमीम रविश

रूह को अपनी तह-ए-दाम नहीं कर सकता

शमीम रविश

आँखों में हिज्र चेहरे पे ग़म की शिकन तो है

शमीम रविश

रौशनी तेज़ करो

शमीम करहानी

राहगुज़र

शमीम करहानी

ज़ुल्मत-गह-ए-दौराँ में सुब्ह-ए-चमन-ए-दिल हूँ

शमीम करहानी

याद की सुब्ह ढल गई शौक़ की शाम हो गई

शमीम करहानी

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