सुबह की सुबह Poetry (page 8)

मैं क्या करूँ कोई सब मेरे इख़्तियार में है

सुहैल अहमद ज़ैदी

दुनिया के कुछ न कुछ तो तलबगार से रहे

सुहैल अहमद ज़ैदी

दुनिया के कुछ न कुछ तो तलबगार से रहे

सुहैल अहमद ज़ैदी

साज़ के मौजों पे नग़्मों की सवारी मैं थी

सूफ़िया अनजुम ताज

वो मुझ से हुए हम-कलाम अल्लाह अल्लाह

सूफ़ी तबस्सुम

सायों से लिपट रहे थे साए

सूफ़ी तबस्सुम

किस ने ग़म के जाल बिखेरे

सूफ़ी तबस्सुम

काविश-ए-बेश-ओ-कम की बात न कर

सूफ़ी तबस्सुम

गुज़रे लम्हों के दोबारा पन्ने खोल रही हूँ मैं

सोनरूपा विशाल

दर-हक़ीक़त रोज़-ओ-शब की तल्ख़ियाँ जाती रहीं

सिया सचदेव

शायद रुख़-ए-हयात से सरके नक़ाब और

सिराजुद्दीन ज़फ़र

ख़ुदा-वंदा ये कैसी सुब्ह-ए-ग़म है

सिराज लखनवी

यौम-ए-आज़ादी

सिराज लखनवी

ये जब्र-ए-ज़िंदगी न उठाएँ तो क्या करें

सिराज लखनवी

ख़याल-ए-दोस्त न मैं याद-ए-यार में गुम हूँ

सिराज लखनवी

वस्ल के दिन शब-ए-हिज्राँ की हक़ीक़त मत पूछ

सिराज औरंगाबादी

तुझ ज़ुल्फ़ की शिकन है मानिंद-ए-दाम गोया

सिराज औरंगाबादी

तेरी भँवों की तेग़ के जो रू-ब-रू हुआ

सिराज औरंगाबादी

अग़्यार छोड़ मुझ सें अगर यार होवेगा

सिराज औरंगाबादी

क्या दास्ताँ थी पहले बयाँ ही नहीं हुई

सिराज अजमली

कैफ़ जो रूह पे तारी है तुझे क्या मालूम

सिकंदर अली वज्द

हज़ार नक़्स हैं मुझ में मिरे कमाल को देख

सिकंदर अली वज्द

न पूछ मर्ग-ए-शनासाई का सबब क्या है

सिद्दीक़ मुजीबी

ग़ाज़ा तो तिरा उतर गया था

सिद्दीक़ अफ़ग़ानी

बुल-हवस में भी न था वो बुत भी हरजाई न था

सिद्दीक़ अफ़ग़ानी

मल्बूस जब हवा ने बदन से चुरा लिए

सिब्त अली सबा

इक़बाल से हम-कलामी

शोरिश काश्मीरी

तेरा चेहरा देख के हर शब सुब्ह दोबारा लिखती है

शोएब निज़ाम

हवस के बीज बदन जब से दिल में बोने लगा

शोएब निज़ाम

दरों को चुनता हूँ दीवार से निकलता हूँ

शोएब निज़ाम

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