तमाशा Poetry (page 4)

जो डर अपनों से है ग़ैरों से वो डर हो नहीं सकता

सय्यद अमीन अशरफ़

फ़साद-ए-क़ल्ब-ओ-नज़र हासिल-ए-तमाशा देख

सय्यद अमीन अशरफ़

बे-लुत्फ़ है ये सोच कि सौदा नहीं रहा

सय्यद अमीन अशरफ़

था आईने के सामने चेहरा खुला हुआ

सय्यद अहमद शमीम

वापस घर जा ख़त्म हुआ

सालेह नदीम

रक़्स-ए-ताऊस-ए-तमन्ना नहीं होने वाला

सुल्तान अख़्तर

छीन ले क़ुव्वत बीनाई ख़ुदाया मुझ से

सुल्तान अख़्तर

अपनी तहज़ीब की दीवार सँभाले हुए हैं

सुल्तान अख़्तर

और कर लेंगे वो क्या अब हमें रुस्वा कर के

सुलैमान अहमद मानी

जैसा हमें गुमान था वैसा नहीं रहा

सुहैल अहमद ज़ैदी

वो तमाशा हूँ हज़ारों मिरे आईने हैं

सिराजुद्दीन ज़फ़र

शौक़ रातों को है दरपय कि तपाँ हो जाऊँ

सिराजुद्दीन ज़फ़र

शौक़ रातों को है दर पे कि तपाँ हो जाऊँ

सिराजुद्दीन ज़फ़र

इश्क़ और अक़्ल में हुई है शर्त

सिराज औरंगाबादी

या-रब कहाँ गया है वो सर्व-ए-शोख़-रा'ना

सिराज औरंगाबादी

हर तरफ़ यार का तमाशा है

सिराज औरंगाबादी

नैरंग-ए-जहाँ रंग-ए-तमाशा है तो क्या है

सिद्दीक़ मुजीबी

आग देखूँ कभी जलता हुआ बिस्तर देखूँ

सिद्दीक़ मुजीबी

बुल-हवस में भी न था वो बुत भी हरजाई न था

सिद्दीक़ अफ़ग़ानी

जाने किस किस की तवज्जोह का तमाशा देखा

शोहरत बुख़ारी

दिल तलबगार-ए-तमाशा क्यूँ था

शोहरत बुख़ारी

ख़ून-ए-दिल होता रहा ख़ून-ए-जिगर होता रहा

शिव रतन लाल बर्क़ पूंछवी

नज़र बहार न देखे तो बे-क़रार न हो

शिव दयाल सहाब

मुझ को कहाँ ये होश तिरी जल्वा-गाह में

शिव दयाल सहाब

ग़र्क़-ए-ग़म हूँ तिरी ख़ुशी के लिए

शिव दयाल सहाब

मुस्लिम-लीग

शिबली नोमानी

कुछ अकेली नहीं मेरी क़िस्मत

शिबली नोमानी

क्या ग़रज़ लाख ख़ुदाई में हों दौलत वाले

ज़ौक़

जो कुछ कि है दुनिया में वो इंसाँ के लिए है

ज़ौक़

मस्लहत के ज़ावियों से किस क़दर अंजान है

शहपर रसूल

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