जाति Poetry (page 19)

कमाल-ए-हुस्न का जब भी ख़याल आया है

अज़ीज़ साबरी

उलझाओ का मज़ा भी तिरी बात ही में था

अज़ीज़ क़ैसी

'मीर'

अज़ीज़ लखनवी

इंतिहा-ए-इश्क़ हो यूँ इश्क़ में कामिल बनो

अज़ीज़ लखनवी

ज़िंदगी के सारे मौसम आ के रुख़्सत हो गए

अज़ीज़ बानो दाराब वफ़ा

वो माहताब अभी बाम पर नहीं आया

अज़हर इक़बाल

वो शब के साए में फ़स्ल-ए-नशात काटते हैं

अज़हर अदीब

सरहद-ए-जिस्म से बाहर कहीं घर लिक्खा था

आज़ाद गुलाटी

सरहद-ए-जिस्म से बाहर कहीं घर लिक्खा था

आज़ाद गुलाटी

फिर इस के बा'द का कोई न हो गुज़र मुझ में

आज़ाद गुलाटी

कभी मिली जो तिरे दर्द की नवा मुझ को

आज़ाद गुलाटी

उतरन पहनोगे

अय्यूब ख़ावर

कोई न देखे गूँज हवा की

अय्यूब ख़ावर

हरीम-ए-हुस्न से आँखों के राब्ते रखना

अय्यूब ख़ावर

घर दरवाज़े से दूरी पर सात समुंदर बीच

अय्यूब ख़ावर

बुझने लगे नज़र तो फिर उस पार देखना

अय्यूब ख़ावर

अश्क को दरिया बनाया आँख को साहिल किया

औरंगज़ेब

आख़िर बिगड़ गए मिरे सब काम होने तक

औरंगज़ेब

रेल की पटरी ने उस के टुकड़े टुकड़े कर दिए

अतीक़ुल्लाह

कीसा-ए-दरवेश में जो भी है ज़र उतना ही है

अतीक़ुल्लाह

एक सूखी हड्डियों का इस तरफ़ अम्बार था

अतीक़ुल्लाह

न-जाने कौन सी मजबूरियाँ हैं जिन के लिए

अतहर नासिक

सफ़र भी जब्र है नाचार करना पड़ता है

अतहर नासिक

चुप-चाप हब्स-ए-वक़्त के पिंजरे में मर गया

अतहर नासिक

दिल की मसर्रतें नई जाँ का मलाल है नया

अतहर नफ़ीस

न मिल सका तरी लहरों में भी क़रार मुझे

अतीक़ अंज़र

अगरचे लाई थी कल रात कुछ नजात हवा

अतीक़ इलाहाबादी

किसे दिमाग़ कि उलझे तिलिस्म-ए-ज़ात के साथ

अताउर्रहमान क़ाज़ी

वो गर्द है कि वक़्त से ओझल तो मैं भी हूँ

अताउल हक़ क़ासमी

आसमानों में भी दरवाज़ा लगा कर देखें

अता तुराब

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