घाव Poetry (page 18)
आशियाने की बात करते हो
रशीद शाहजहाँपुरी
दर जो खोला है कभी उस से शनासाई का
राशिद नूर
किस शय का सुराग़ दे रहा हूँ
राशिद मुफ़्ती
ये वाक़िआ तो लगे है सुना हुआ सा कुछ
राशिद जमाल फ़ारूक़ी
साया था मेरा और मिरे शैदाइयों में था
राशिद आज़र
नहीं था ज़ख़्म तो आँसू कोई सजा लेता
रशीद निसार
वस्ल के दिन का इशारा है कि ढल जाऊँगा
रशीद लखनवी
मुझ को मंज़ूर है मरने पे सुबुक-बारी हो
रशीद लखनवी
जोश-ए-वहशत मेरे तलवों को ये ईज़ा भी सही
रशीद लखनवी
जो मुझे मर्ग़ूब हो वो सोगवारी चाहिए
रशीद लखनवी
हम अजल के आने पर भी तिरा इंतिज़ार करते
रशीद लखनवी
गर्म रफ़्तार है तेरी ये पता देते हैं
रशीद लखनवी
शाम से पहले घर गए होते
रसा चुग़ताई
सौदा-ए-सज्दा शाम-ओ-सहर मेरे सर में है
रंजूर अज़ीमाबादी
अगर ये चेहरा यूँही गर्द से अटा रहेगा
राना आमिर लियाक़त
ज़ख़्म इस ज़ख़्म पे तहरीर किया जाएगा
रम्ज़ी असीम
नुक़रई उजाले पर सुरमई अंधेरा है
रमेश कँवल
अपनों के दरमियान सलामत नहीं रहे
रमेश कँवल
मुस्कुराती आँखों को दोस्तों की नम करना
राम रियाज़
हम तो दिन-रात इसी सोच में मर जाएँगे
राम नाथ असीर
फिर कोई ख़लिश नज़्द-ए-राग-ए-जाँ तो नहीं है
राम कृष्ण मुज़्तर
फिर भीग चलीं आँखें चलने लगी पुर्वाई
राम कृष्ण मुज़्तर
ये ज़ख़्म ज़ख़्म बदन और नम फ़ज़ाओं में
राम अवतार गुप्ता मुज़्तर
हर जाद-ए-शहर
राजेन्द्र मनचंदा बानी
ज़माँ मकाँ थे मिरे सामने बिखरते हुए
राजेन्द्र मनचंदा बानी
मस्त उड़ते परिंदों को आवाज़ मत दो कि डर जाएँगे
राजेन्द्र मनचंदा बानी
मरीज़-ए-हिज्र को सेहत से अब तो काम नहीं
रजब अली बेग सुरूर
जैसे फ़साना ख़त्म हुआ
राज नारायण राज़
शमएँ जुगनू चाँद के हाले जम्अ करो
राज खेती
शमएँ जुगनू चाँद के हाले जम्अ' करो
राज खेती
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