ज़ीस्त Poetry (page 17)

दिल अजनबी देस में लगा है

अशफ़ाक़ हुसैन

हुसैन

असग़र मेहदी होश

घरौंदे

असग़र मेहदी होश

मता-ए-ज़ीस्त क्या हम ज़ीस्त का हासिल समझते हैं

असग़र गोंडवी

लुत्फ़ गुनाह में मिला और न मज़ा सवाब में

असर सहबाई

झपकी ज़रा जो आँख जवानी गुज़र गई

असर लखनवी

तुम्हें क्या काम नालों से तुम्हें क्या काम आहों से

आरज़ू लखनवी

जितना था सरगर्म-ए-कार उतना ही दिल नाकाम था

आरज़ू लखनवी

मैं ने उसी से हाथ मिलाया था और बस

अरशद महमूद अरशद

धूप छाँव के दरमियाँ

अरशद कमाल

कुछ तो मिल जाए कहीं दीदा-ए-पुर-नम के सिवा

अरशद कमाल

हम ज़ीस्त की मौजों से किनारा नहीं करते

अरशद कमाल

हर एक लम्हा-ए-ग़म बहर-ए-बे-कराँ की तरह

अरशद कमाल

फ़िक्र सोई है सर-ए-शाम जगा दी जाए

अरशद कमाल

फ़ना हुआ तो मैं तार-ए-नफ़स में लौट आया

अरशद जमाल 'सारिम'

यार के नर्गिस-ए-बीमार का बीमार रहा

अरशद अली ख़ान क़लक़

डोरा नहीं है सुरमे का चश्म-ए-सियाह में

अरशद अली ख़ान क़लक़

एहसास-ए-हुस्न बन के नज़र में समा गए

अर्श मलसियानी

तिरे बाज़ूओं का सहारा तो ले लूँ मगर उन में भी रच गई है थकन

आरिफ़ अब्दुल मतीन

तिरे बाज़ुओं का सहारा तो ले लूँ मगर इन में भी रच गई है थकन

आरिफ़ अब्दुल मतीन

शायद कोई कमी मेरे अंदर कहीं पे है

अक़ील शादाब

उसी अमल की ज़रा सी शराब देता चल

अनवर नदीम

नज़र आए क्या मुझ से फ़ानी की सूरत

अनवर देहलवी

अब अपना हाल हम उन्हें तहरीर कर चुके

अनवर देहलवी

जब मिरी ज़ीस्त के उनवाँ नए मतलूब हुए

अनवर मोअज़्ज़म

सितमगरों से डरूँ चुप रहूँ निबाह करूँ

अंजुम ख़लीक़

जब तक फ़सील-ए-जिस्म का दर खुल न जाएगा

अंजुम ख़लीक़

तेशा-ब-कफ़ को आइना-गर कह दिया गया

अंजुम इरफ़ानी

जाते ही उन के ज़ीस्त की सूरत बदल गई

अनीसा बेगम

शीशा ही चाहिए न मय-ए-अर्ग़वाँ मुझे

अनीस अहमद अनीस

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