आंख Poetry (page 12)

न कहो ए'तिबार है किस का

शैख़ अली बख़्श बीमार

ज़बाँ का ज़ाविया लफ़्ज़ों की ख़ू समझता है

शहपर रसूल

मेरी नज़र का मुद्दआ उस के सिवा कुछ भी नहीं

शहपर रसूल

बे-इंतिहा होना है तो इस ख़ाक के हो जाओ

शहपर रसूल

शोख़ी ने तेरी लुत्फ़ न रक्खा हिजाब में

मुस्तफ़ा ख़ाँ शेफ़्ता

गोर में याद-ए-क़द-ए-यार ने सोने न दिया

मुस्तफ़ा ख़ाँ शेफ़्ता

मेरे अल्फ़ाज़ में असर रख दे

शीन काफ़ निज़ाम

मौज-ए-हवा तो अब के अजब काम कर गई

शीन काफ़ निज़ाम

अक्स ने आईने का घर छोड़ा

शीन काफ़ निज़ाम

दिल-ओ-निगाह के हुस्न-ओ-क़रार का मौसम

शाज़िया अकबर

संग-आबाद की एक दुकाँ

शाज़ तमकनत

दर-गुज़र

शाज़ तमकनत

ज़रा सी बात थी बात आ गई जुदाई तक

शाज़ तमकनत

साँसों में बसे हो तुम आँखों में छुपा लूँगा

शाज़ तमकनत

मिरे नसीब ने जब मुझ से इंतिक़ाम लिया

शाज़ तमकनत

जाने वाले तुझे कब देख सकूँ बार-ए-दिगर

शाज़ तमकनत

राज़ में रक्खेंगे हम तेरी क़सम ऐ नासेह

शौक़ बहराइची

मेरे महबूब मिरे दिल को जलाया न करो

शौकत परदेसी

मुक़ाबिल इक ज़माना और सफ़-आराई मेरी

शौकत मेहदी

शिद्दत-ए-दर्द-ए-जिगर हो ये ज़रूरी तो नहीं

शातिर हकीमी

दर्द में जब कमी सी होती है

शातिर हकीमी

हो सबब कुछ भी मिरे आँख बचाने का मगर

शारिक़ कैफ़ी

ख़ाक को मैं ख़्वार क्यूँ करता

शारिक़ कैफ़ी

अजब मुश्किल है मेरी

शारिक़ कैफ़ी

सूना आँगन नींद में ऐसे चौंक उठा है

शारिक़ कैफ़ी

पहली बार वो ख़त लिक्खा था

शारिक़ कैफ़ी

कोई कुछ भी कहता रहे सब ख़ामोशी से सुन लेता है

शारिक़ कैफ़ी

इंतिहा तक बात ले जाता हूँ मैं

शारिक़ कैफ़ी

होने से मिरे फ़र्क़ ही पड़ता था भला क्या

शारिक़ कैफ़ी

बे-तकल्लुफ़ मिरा हैजान बनाता है मुझे

शारिक़ कैफ़ी

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